मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवादों और चर्चाओं के बीच एक नया तर्क गढ़ा जा रहा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और उनका गठबंधन यह घोषणा करे कि ज्ञानेश कुमार के रहते वे चुनाव नहीं लड़ेंगे, यानी चुनाव का बहिष्कार करेंगे। यह तर्क न तो लोकतांत्रिक है, न ऐतिहासिक कसौटी पर खरा उतरता है। सत्ता पक्ष से असहयोग कोई नई बात नहीं, पर बहिष्कार का हथियार हमेशा उल्टा पड़ा है।

1971 में इंदिरा गांधी बांग्लादेश के अभ्युदय के लिए निर्णायक युद्ध चाहती थीं, लेकिन वह राष्ट्रीय सहमति को लेकर आश्वस्त नहीं थीं। खासकर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले जनसंघ के रुख को लेकर। उन्होंने अपनी चिंता जयप्रकाश नारायण से साझा की। जेपी ने अटल जी को पटना बुलाया और पूछा – यदि युद्ध हुआ तो जनसंघ का रुख क्या होगा?

तब अटल जी ने महाभारत का प्रसंग सुनाया। युधिष्ठिर को सूचना मिली कि कौरवों का कोई भाई तीसरे पक्ष से हार रहा है। युधिष्ठिर ने भीम से कहा – जाकर कौरव भाई की मदद करो। भीम भड़क गए। तब युधिष्ठिर ने कहा – आपस में हम 5 पांडव और 100 कौरव दो पक्ष हैं, पर तीसरे शत्रु के सामने हम 105 हैं।

प्रसंग सुनाकर अटल जी ने कहा – इंदिरा जी से हमारे आंतरिक और वैचारिक मतभेद हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि युद्ध की घड़ी में हम सरकार का विरोध करेंगे। युद्ध हुआ तो जनसंघ सरकार के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। 3 दिसंबर 1971 को युद्ध शुरू हुआ और 6 दिसंबर को लोकसभा में अटल जी ने इंदिरा जी को दुर्गावतार कहा। यही लोकतंत्र की मर्यादा है कि असहमति देश से बड़ी नहीं है।

बिहार आंदोलन में 12 अप्रैल 1974 को गया गोलीकांड के बाद जेपी ने मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के इस्तीफे और विधानसभा भंग करने की मांग तेज की। विपक्षी विधायकों ने इस्तीफे दिए, 5 जून 1974 को एक करोड़ हस्ताक्षर राज्यपाल आर.डी. भंडारे को सौंपे गए और उसी दिन पटना के गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का आह्वान हुआ।

1977 की वोट क्रांति से पहले 17 जनवरी 1977 तक किसी को चुनाव की उम्मीद नहीं थी। सत्ता पक्ष कह रहा था – आपातकाल अनुशासन पर्व है। विपक्ष हताश था,अनेक लोग जेल में थे। पर जेपी कहते थे – हर तानाशाह चाहता है कि इतिहास उसे लोकतंत्रवादी लिखे, इसलिए इंदिरा जी 1980 से पहले चुनाव जरूर कराएंगी। 18 जनवरी 1977 को इंदिरा जी ने चुनाव की घोषणा की। जेल से छूटते ही अटल जी पटना में जेपी से मिले और विनती की – इतने कम समय में चुनाव लड़ना असंभव है, आप बहिष्कार की अपील करें।

जेपी लोकनायक थे। उन्होंने कहा – किसी नेता को शत-प्रतिशत जनसमर्थन का भ्रम नहीं पालना चाहिए। कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन की पार्टी है। अगर मेरे बहिष्कार के बाद भी 10% लोगों ने वोट डाल दिया, तो उसी पर परिणाम घोषित होगा और वही जनमत मान लिया जाएगा। इंदिरा जी फिर प्रधानमंत्री बन जाएंगी। इसलिए चुनाव लड़ना ही होगा। अंततः 1977 ने साबित किया कि जेपी सही थे।

1980 में असम आंदोलन उफान पर था – मांग थी घुसपैठियों को बाहर निकालो। 1983 में विधानसभा चुनाव आए। असम गण परिषद ने बहिष्कार किया। संगीनों के साए में फरवरी 1983 में चुनाव हुए। परिणाम, 73 लाख मतदाताओं में से 24 लाख ने भी वोट नहीं डाला। 1978 में 53% मतदान हुआ था, 1983 में सिर्फ 32.74%। इस 32.74% में से कांग्रेस को 52.53% मिला, यानी कुल मतदाताओं के 18% से भी कम वोट पर कांग्रेस सत्ता में आई और हितेश्वर सैकिया मुख्यमंत्री बने। हिंसा में करीब 2000 लोग मारे गए। बाद में खुद राजीव गांधी ने माना कि यह विधानसभा जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करती। 15 अगस्त 1985 को असम समझौते के बाद विधानसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव हुए और प्रफुल्ल महंत मुख्यमंत्री बने। इतिहास गवाह है कि 1977 में चुनाव लड़ने का फैसला सही था और 1983 में बहिष्कार का फैसला गलत।

मुख्य चुनाव आयुक्त पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, पर चुनाव से भागना लोकतंत्र से भागना है। चुनाव आयोग व्यक्ति नहीं, संस्था है। संस्था को दुरुस्त करने की लड़ाई चुनाव मैदान में ही लड़ी जाती है, मैदान छोड़कर नहीं।(पंकज श्रीवास्तव-विनायक फीचर्स)

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