कुछ पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं होतीं, वे युगों की चेतना बन जाती हैं। जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, धरा पर अंधेरा कहीं रह न जाये… ऐसी ही एक पंक्ति है। इसमें दीपावली का उल्लास भी है, वेदों का ज्ञान भी, उपनिषदों का आत्मबोध भी और मानवता के भविष्य का महान संकल्प भी। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि दीपक जलाना परंपरा है, लेकिन किसी दूसरे के जीवन से अंधकार मिटाना संस्कृति है।

दीपक की एक छोटी-सी लौ में जीवन का विराट दर्शन छिपा है। मिट्टी का पात्र धरती से जुड़ाव सिखाता है, तेल या घी पोषण का प्रतीक है, बाती निरंतर प्रयास का संकेत है और अग्नि प्रकाश तथा ऊर्जा की अभिव्यक्ति है। इन सबके संतुलित संयोग से प्रकाश जन्म लेता है। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। ज्ञान हो, लेकिन विवेक न हो तो दिशा भटक सकती है। सामर्थ्य हो, लेकिन संवेदना न हो तो शक्ति अहंकार बन जाती है। धन हो, लेकिन धर्मसम्मत आचरण न हो तो समृद्धि भी अशांति का कारण बन सकती है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में अग्नि केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, यज्ञ, समर्पण और कल्याणकारी कर्म का प्रतीक भी है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि की स्तुति से प्रारंभ होता है

 

*अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।*

 

और उपनिषदों की शाश्वत प्रार्थना है –

 

*तमसो मा ज्योतिर्गमय।*

 

अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यहाँ अंधकार केवल रात्रि का नहीं, अज्ञान, अविवेक और अन्याय का भी है। प्रकाश केवल आँखों को दिखाई देने वाला उजाला नहीं, सत्य को पहचानने वाली चेतना भी है। इसलिए दीपोत्सव का वास्तविक अर्थ है – अपने भीतर ज्ञान जगाना और अपने कर्मों से संसार को प्रकाशित करना।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारे घर का प्रकाश ही पर्याप्त है? क्या हमारे आँगन में सैकड़ों दीपक जलने के बाद हमारा सामाजिक दायित्व समाप्त हो जाता है?

नहीं! भारतीय संस्कृति की उदार दृष्टि अपने सुख को संपूर्ण समाज के सुख से जोड़ती है।

*सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।*

यह केवल मंत्रोच्चार नहीं, मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की घोषणा है। जिस गाँव में किसी कुम्हार के घर का चूल्हा न जले, जहाँ किसी बच्चे को आर्थिक अभाव में शिक्षा न मिले, जहाँ किसी वृद्ध को भोजन और किसी बीमार को उपचार न मिले, वहाँ हमारे उत्सव की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

हमारे घर का दीपक तभी पूर्ण अर्थ प्राप्त करता है जब उसकी रोशनी किसी दूसरे के जीवन तक भी पहुँचे। मिट्टी का दीपक खरीदना कुम्हार की आजीविका में सहयोग है। किसी बच्चे को पुस्तक देना उसके भविष्य में प्रकाश भरना है। भूखे को भोजन कराना उसकी रात में संतोष का दीप जलाना है। किसी निराश व्यक्ति को सम्मान देना उसके आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करना है।

यही अन्त्योदय है – समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान, अवसर और समृद्धि का प्रकाश पहुँचाना।

विज्ञान की दृष्टि से दीपक दहन की प्रक्रिया से प्रकाश और ऊष्मा उत्पन्न करता है। प्रकाश हमारे परिवेश को देखने और दैनिक गतिविधियों को करने में सहायक है। शांत भाव से दीपशिखा को देखना एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास बन सकता है। किंतु दीपक के धुएँ या घी की सुगंध से मस्तिष्क की विशेष कोशिकाएँ खुलने अथवा भय समाप्त होने जैसे दावों को प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं मानना चाहिए। आस्था और विज्ञान का अपना-अपना क्षेत्र है। सच्ची चेतना दोनों के प्रति ईमानदार रहती है।

आज धरती पर अंधकार के अनेक रूप हैं। कहीं अशिक्षा है, कहीं बेरोजगारी, कहीं आर्थिक असमानता, कहीं हिंसा और नफरत, कहीं अकेलापन और निराशा। किसी किसान की मेहनत का उचित मूल्य न मिलना अंधकार है। किसी महिला का असुरक्षित होना अंधकार है। किसी प्रतिभाशाली बच्चे का अवसरों के अभाव में पीछे रह जाना अंधकार है। और सबसे भयावह अंधकार वह है, जब हम दूसरों का दुःख देखकर भी संवेदनहीन बने रहें। इसलिए इस दीपोत्सव पाँच दीपों के साथ पाँच संकल्प भी जलाएँ।

ज्ञान का दीप – कम से कम एक जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा में सहयोग करेंगे।

करुणा का दीप – किसी भूखे को भोजन और जरूरतमंद को यथासंभव सहायता देंगे।

स्वावलंबन का दीप – स्थानीय कारीगरों, कुम्हारों और श्रमिकों के श्रम का सम्मान करेंगे।

सद्भाव का दीप – जाति, भाषा, क्षेत्र और विचारों के भेद से ऊपर उठकर मानवीय संबंध मजबूत करेंगे।

आत्मबोध का दीप – अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या, छल और अन्याय की प्रवृत्तियों को पहचानकर सुधारेंगे।

याद रखिए, दीपक की सार्थकता उसकी ऊँचाई से नहीं, उसके प्रकाश से निर्धारित होती है। मनुष्य की महानता उसके पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से नहीं, बल्कि इस बात से पहचानी जाती है कि उसके होने से कितने जीवन बेहतर हुए।

आज संसार को बारूद की चकाचौंध नहीं, मानवीय संवेदना का प्रकाश चाहिए। ऐसी समृद्धि चाहिए जिसमें किसी की भूख पर किसी का वैभव खड़ा न हो। ऐसा विकास चाहिए जिसमें प्रकृति, समाज और मनुष्य तीनों का सम्मान सुरक्षित रहे।

आइए, इस दीपोत्सव केवल घरों की चौखटें नहीं, हृदय के द्वार भी प्रकाशित करें। हमारी वाणी किसी टूटे मन को सहारा दे, हमारे कर्म किसी वंचित को अवसर दें, हमारी कमाई किसी जरूरतमंद के काम आए और हमारी उपलब्धियाँ समाज के लिए उपयोगी बनें।

क्योंकि दीपावली का सर्वोच्च उत्सव वह नहीं, जब केवल हमारा घर जगमगाए बल्कि वह है, जब हमारे कारण किसी दूसरे के जीवन में भी आशा का सूर्योदय हो।

हमारे बाद भी हमारे विचारों का प्रकाश जीवित रहे, हमारे बच्चों में संस्कार बनकर, समाज में सद्भाव बनकर और धरती पर मानवता बनकर।

आओ, ऐसा दीप जलाएँ जिसकी लौ में स्वार्थ नहीं, सेवा हो, जिसकी रोशनी में अहंकार नहीं, करुणा हो और जिसके प्रकाश में केवल अपना परिवार नहीं, संपूर्ण संसार समाहित हो।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, धरा पर अंधेरा कहीं रह न जाये…(डॉ. दीपक गोस्वामी-विभूति फीचर्स)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here