डॉ.मुकेश कबीर

 

पंकज उधास मुकद्दर के सिकंदर थे,उन्हे ग़ज़ल गायकी का राजेश खन्ना कहा जा सकता है,राजेश खन्ना की तरह ही पंकज जी का कैरियर और स्टारडम रहा बड़े बैक ग्राउंड के कारण ब्रेक तो घर बैठे ही मिला लेकिन फिर संघर्ष और बाद में ऐसे चमके कि पूरा फलक ही रोशन किया और सबसे खास बात यह कि अपने से बेहतर फनकारों को पीछे छोड़कर एक दशक तक एकछत्र राज किया लेकिन फिर ग्राफ गिरा तो उठा नही और आख़िर में कैंसर..।पंकज जी की अपार सफलता आश्चर्यजनक भी है क्योंकि उनके पास न तो मेंहदी हसन जैसा इंप्रोवाजेशन था न गुलाम अली जैसी मुर्कियां और न ही जगजीत जैसी रेंज लेकिन फिर भी उन्होंने इन सबको बहुत पीछे छोड़ दिया और आम आदमी में गज़ल का पर्याय बने,शायद इसका सबसे बड़ा कारण उनकी सरलता थी।उनकी खूबसूरती भी ऐसी थी कि फिल्मों में उनको गज़ल गायक की भूमिका ही मिल गई और घर घर में लोकप्रिय हो गए।पंकज जी की एक और खासियत यह रही कि उन्होंने कभी भी स्टारडम को हावी नहीं होने दिया और सबके साथ फैमिलियर होकर रहे,जागीरदार परिवार में जन्म के कारण रॉयल जीवन शैली जरूर रही लेकिन ईगो कभी नही रहा,सालों तक कैंसर पीड़ितों की मदद की,उन्हें कैंसर से लड़ने की ताकत देते रहे लेकिन नियति ऐसी कि आखिर में खुद कैंसर का शिकार हो गए।अब क्या कहें समझ नही आता। उनकी ही कुछ पंक्तियां हैं -खून के रिश्ते तोड़ गया तू,आंख में आंसू छोड़ गया तू… (विभूति फीचर्स)