तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं, त्याग, बलिदान और गौरव का प्रतीक है।” भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा प्रत्येक भारतीय के आत्मसम्मान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। इसकी तीनों रंग-पट्टियाँ और अशोक चक्र हमारे राष्ट्र के आदर्शों, मूल्यों और विकास यात्रा की प्रेरणा देते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से तिरंगा केवल सरकारी भवनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में सम्मान और गर्व का विषय बना। इसी भावना को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने “हर घर तिरंगा अभियान” का शुभारंभ किया, जो आज एक जनआंदोलन का स्वरूप धारण कर चुका है।

“हर घर तिरंगा” अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रध्वज के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ना तथा राष्ट्रप्रेम की भावना को सुदृढ़ करना है। इस अभियान का उद्देश्य केवल घरों पर तिरंगा फहराना नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय को अपने राष्ट्र के गौरव, स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराना भी है। यह अभियान नागरिकों में राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान और अपनत्व की भावना विकसित करता है तथा यह संदेश देता है कि भारत की शक्ति उसकी एकता, विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है।

वर्ष 2022 में भारत ने स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर “आज़ादी का अमृत महोत्सव” मनाया। इसी अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में “हर घर तिरंगा” अभियान प्रारंभ किया गया। इस अभियान को देशभर में अभूतपूर्व जनसमर्थन प्राप्त हुआ। करोड़ों परिवारों ने अपने घरों, कार्यालयों, दुकानों, विद्यालयों और संस्थानों पर तिरंगा फहराकर राष्ट्रप्रेम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। इसके बाद यह अभियान प्रत्येक वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाने लगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, पंचायतों और शहरी निकायों ने इसे जनभागीदारी का उत्सव बना दिया। हर घर तिरंगा अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि नागरिक सहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें देश के बच्चों, युवाओं, महिलाओं, किसानों, सैनिकों, शिक्षकों, व्यापारियों और कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। विद्यालयों में तिरंगा यात्रा, प्रभात फेरी, देशभक्ति गीत, निबंध एवं चित्रकला प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। युवा सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान को नई ऊर्जा देते हैं। विभिन्न स्वयंसेवी संगठन और सामाजिक संस्थाएँ तिरंगा वितरण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं।

आज का युवा भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। हर घर तिरंगा अभियान युवाओं में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करता है। जब युवा स्वयं तिरंगा लेकर अभियान में भाग लेते हैं, तब वे केवल ध्वज नहीं फहराते, बल्कि राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का संकल्प भी लेते हैं। यह अभियान युवाओं को स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, संविधान के आदर्शों और भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन गया है।

यह अभियान राष्ट्रीय एकता एवं एकात्मकता का भी प्रतीक है हमारा भारत अनेक भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और विविधताओं वाला देश है, लेकिन तिरंगा हम सभी को एक सूत्र में बाँधता है। चाहे हिमालय की ऊँचाइयाँ हों, रेगिस्तान की धरती, समुद्र तट या उत्तर-पूर्व का कोई गाँव,हर स्थान पर एक ही तिरंगा पूरे देश की एकता का संदेश देता है।

हर घर तिरंगा अभियान यह सिद्ध करता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता है। यह अभियान जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म से ऊपर उठकर केवल भारतीय होने का गौरव अनुभव कराता है।

आज जब तिरंगा पूरे विश्व में भारत की पहचान बन चुका है, तब यह जानना अत्यंत प्रेरणादायक है कि इसे राष्ट्रध्वज बनने तक पहुँचने में कई दशकों का संघर्ष, विचार-विमर्श और राष्ट्रभक्तों का समर्पण लगा।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। स्वतंत्रता आंदोलन तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, किंतु पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई साझा राष्ट्रीय ध्वज नहीं था। विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों और राष्ट्रीय नेताओं ने अनुभव किया कि जैसे प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, वैसे ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को भी एक ऐसे ध्वज की आवश्यकता है जो समस्त देशवासियों को एक सूत्र में बाँध सके। 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के पारसी बागान स्क्वायर में भारत के प्रथम अनौपचारिक राष्ट्रीय ध्वज को फहराया गया। इसमें हरे, पीले और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियाँ थीं। इस ध्वज पर कमल के पुष्प, “वंदे मातरम्” और सूर्य-चंद्र के प्रतीक अंकित थे। यद्यपि इसे आधिकारिक मान्यता नहीं मिली, फिर भी इसने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उसके बाद महान स्वतंत्रता सेनानी मैडम भीकाजी कामा ने सन 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारतीय ध्वज फहराकर विश्व समुदाय के सामने भारत की स्वतंत्रता की माँग को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। यह पहली बार था जब भारत का ध्वज किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहराया गया। इस ऐतिहासिक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाई। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व में चलाए गए होम रूल आंदोलन के दौरान 1917 में एक नया ध्वज अपनाया गया। इसमें पाँच लाल और चार हरी पट्टियाँ, सप्तऋषि तारामंडल तथा एक कोने में ब्रिटिश यूनियन जैक और अर्धचंद्र-सितारा अंकित थे। यह ध्वज स्वतंत्रता आंदोलन की नई दिशा का प्रतीक बना, किंतु व्यापक राष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सका।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में पिंगली वेंकैया का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे एक शिक्षाविद्, कृषिविज्ञानी और प्रखर राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने वर्षों तक विभिन्न देशों के ध्वजों का अध्ययन किया और भारत के लिए उपयुक्त ध्वज की रूपरेखा तैयार की। 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी के समक्ष अपने ध्वज का प्रारूप प्रस्तुत किया। प्रारंभिक स्वरूप में लाल और हरे रंग थे, जो देश के प्रमुख समुदायों का प्रतीक माने गए। महात्मा गांधी के सुझाव पर इसमें सफेद रंग जोड़ा गया तथा मध्य में चरखा अंकित किया गया। चरखा स्वावलंबन, श्रम, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। 1931 भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास का महत्वपूर्ण वर्ष था। उस समय यह अनुभव किया गया कि ध्वज किसी धर्म या समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करे। इसलिए एक नए ध्वज को स्वीकार किया जिसमें ऊपर भगवा, बीच में सफेद, नीचे हरा रंग तथा मध्य में नीले रंग का चरखा था। यही ध्वज वर्तमान तिरंगे का प्रत्यक्ष आधार बना। इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया कि ध्वज के रंगों का संबंध किसी धर्म से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आदर्शों और मूल्यों से है।

22 जुलाई 1947 का दिन भारतीय इतिहास में अत्यंत गौरवपूर्ण है। स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ सप्ताह पूर्व संविधान सभा ने सर्वसम्मति से वर्तमान तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया। इस ध्वज में 1931 के तिरंगे को ही आधार बनाया गया, किंतु चरखे के स्थान पर सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के धर्मचक्र को स्थान दिया गया। अशोक चक्र में 24 तीलियाँ हैं, जो धर्म, न्याय, गति, कर्तव्य, प्रगति और निरंतर कर्म का संदेश देती हैं। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब यही तिरंगा स्वतंत्र भारत के गौरवपूर्ण राष्ट्रीय ध्वज के रूप में लाल किले सहित पूरे देश में पहली बार आधिकारिक रूप से फहराया गया।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज की प्रत्येक पट्टी गहरा संदेश देती है,भगवा (केसरिया) रंग साहस, त्याग, आत्मसंयम और राष्ट्रसेवा का प्रतीक है। यह हमें व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है। सफेद रंग सत्य, शांति, पारदर्शिता और नैतिकता का प्रतीक है। यह समाज में सद्भाव और विश्वास बनाए रखने का संदेश देता है। हरा रंग समृद्धि, कृषि, पर्यावरण, विकास और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। यह भारत की उर्वरता और प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।

अशोक चक्र नीले रंग का 24 तीलियों वाला धर्मचक्र निरंतर गति और कर्म का संदेश देता है। इसका अर्थ है कि राष्ट्र कभी ठहरना नहीं चाहिए, बल्कि सतत विकास के पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक बन गया। असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे हाथ में लेकर सत्याग्रह किए, जेल यात्राएँ कीं और अनेक वीरों ने इसी ध्वज की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

तिरंगा लोगों के मन में स्वतंत्र भारत के सपने को जीवित रखता था। यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका था।

आज तिरंगा केवल सरकारी भवनों तक सीमित नहीं है। “हर घर तिरंगा” जैसे जनआंदोलनों ने इसे प्रत्येक भारतीय के घर और हृदय तक पहुँचा दिया है। अंतरिक्ष मिशनों, ओलंपिक, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, वैज्ञानिक उपलब्धियों, सैन्य पराक्रम और खेल प्रतियोगिताओं में जब तिरंगा लहराता है, तब प्रत्येक भारतीय गर्व से भर उठता है।

भारतीय ध्वज संहिता में समय-समय पर किए गए संशोधनों ने नागरिकों को सम्मानपूर्वक तिरंगा फहराने का अधिकार और अवसर प्रदान किया है। इससे राष्ट्रीय ध्वज के प्रति जनभागीदारी और सम्मान दोनों में वृद्धि हुई है।

तिरंगे की राष्ट्रध्वज बनने की यात्रा भारत के स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक विकास की यात्रा है। 1906 के प्रारंभिक ध्वज से लेकर 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा द्वारा इसे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किए जाने तक की यह कहानी लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, बलिदान और राष्ट्रभक्ति से जुड़ी हुई है। आज तिरंगा हमें केवल अतीत की गौरवगाथा का ही स्मरण नहीं कराता, बल्कि वर्तमान में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और भविष्य के विकसित, आत्मनिर्भर तथा विश्वगुरु भारत के निर्माण के लिए प्रेरित भी करता है।

राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक एवं नैतिक दायित्व है। तिरंगा फहराते समय भारतीय ध्वज संहिता (Flag Code of India) का पालन करना आवश्यक है। ध्वज सदैव सम्मानपूर्वक फहराया जाए, उसे क्षतिग्रस्त या अपमानित न होने दिया जाए तथा उपयोग के पश्चात उसका सम्मानजनक संरक्षण या निर्धारित नियमों के अनुसार निस्तारण किया जाए।

तिरंगे का सम्मान केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि हमारे व्यवहार, कर्तव्यों और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण में भी दिखाई देना चाहिए। आज भारत प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर तेज़ी से अग्रसर है। इस राष्ट्रीय संकल्प की सफलता तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करे। हर घर तिरंगा अभियान इसी भावना को मजबूत करता है। यह अभियान हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। जब प्रत्येक घर पर तिरंगा लहराता है, तब वह केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि विकसित, आत्मनिर्भर, समृद्ध और सशक्त भारत के संकल्प का प्रतीक बन जाता है।

हर घर तिरंगा अभियान भारत की राष्ट्रीय चेतना, जनभागीदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रेरणादायी उत्सव है। यह केवल ध्वज फहराने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, कर्तव्य और समर्पण की भावना का महापर्व है। तिरंगे के नीचे खड़े होकर प्रत्येक भारतीय यह संकल्प ले कि वह राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेगा, संविधान का सम्मान करेगा और भारत को विश्व में सर्वोच्च स्थान दिलाने के लिए अपना सर्वोत्तम योगदान देगा। (सुरेन्द्र शर्मा-विभूति फीचर्स)

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