संसद का मानसून सत्र दो सप्ताह से हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। सिर्फ एंटी पेपर लीक बिल पर बहस हुई। यह बहस भी औपचारिक ही रही। बहस में शिक्षा सुधार के लिए ठोस, तर्कसंगत सुझावों का अभाव देखा गया। विपक्ष ने सरकार पर तोहमतें लगाईं और एनडीए के सांसदों ने सरकार को महान साबित करने की कोशिश की। इसके पहले और इसके बाद संसद में कोई काम नहीं हुआ। हंगामे के बीच जो काम हुए उनमें विपक्ष की कोई भूमिका नहीं रही। सरकार ने कई बिल बिना चर्चा के पास करा लिए।
ऐसा लग रहा है सरकार सोशल मीडिया पर चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कम से कम तीन बार सोशल मीडिया पर देश और युवाओं को संदेश दे चुके हैं। गृह मंत्री अमित शाह भी सोशल मीडिया पर ही अपनी बात रख रहे हैं। विपक्ष दोनों नेताओं से संसद में आकर जवाब देने की मांग कर रहा है। ऐसे कई मौके हैं जब कोई प्रधानमंत्री या मंत्री संसद नहीं आए मोदी-शाह अपवाद नहीं हैं। लेकिन दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री इसी जगह मंगल मिलन की बैठक में शामिल होते हैं, नए राज्यसभा सांसदों से मिलते हैं, पर सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेते। यानि सदन की कार्यवाही भी नहीं चल पा रही है, जनता के लिए कानून भी बनते जा रहे हैं, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री देश में हैं, सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, पर संसद नहीं आ रहे हैं और साथ ही विपक्ष भी अपनी जिद पर कायम है।
सवाल दोनों पक्षों से होना चाहिए-क्या यह स्थिति संसद के औचित्य को कमजोर नहीं करती?
साहस तब नहीं दिखाया जाता जब परिस्थितियां अनुकूल हों। साहस प्रतिकूल परिस्थितियों में जवाबदेही लेने और जिम्मेदारियों को संभालने में होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कई मौकों पर लंबे-चौड़े भाषण संसद में दिए हैं। लेकिन किसान आंदोलन के बाद दूसरी बार शायद ऐसा मौका है जब रणनीतिकारों को ऐसा कोई ठोस जवाब तैयार करने का उपाय नहीं सूझ रहा जिससे विपक्ष के सवाल उसी के गले में फंसाए जा सकें। हालांकि कोशिश जारी है। कहा जा रहा है कि विपक्षी सांसद विपक्ष शासित राज्यों में हुए पेपर लीक के मामले नहीं उठा रहे हैं। इस तर्क का इस्तेमाल सीजेपी के ऊपर भी किया गया। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। इस तर्क के सहारे विपक्ष को तो घेरा जा सकता है, सीजेपी या छात्रों को नहीं।
जब देश के चुनाव होते हैं तब चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल यह नहीं कहते कि जनता के अधिकारों की रक्षा हम वहीं करेंगे जिन राज्य में हमारी सरकारें होंगी। संघीय व्यवस्था में राज्यों के अपने अधिकार हैं। सबके घोषणा पत्र में देश की बात होती है। इसलिए छात्रों को इससे कोई लेना देना नहीं है कि पेपर लीक कहां हो रहा है? उनकी समस्या सिर्फ पेपर लीक है और प्रधानमंत्री देश के सर्वेसर्वा है, जिन्होंने युवाओं के हित की रक्षा करने की गारंटी दे रखी है। तो फिर छात्र क्यों सरकारी दफ्तरों की तरह एक बाबू से दूसरे बाबू की टेबल पर चक्कर लगाएं? क्यों मध्यप्रदेश जाएं, क्यों पंजाब जाएं और क्यों उत्तर प्रदेश या झारखंड या महाराष्ट जाएं। सीधे हायर अथॉरिटी से मांग क्यों नहीं होनी चाहिए? अब हायर अथॉरिटी की जिम्मेदारी है कि वह अपनी गारंटी पूरी करे। जब राजनीतिक लाभ वाली घटनाओं को लेकर राज्यों से जवाब तलब किया जा सकता है, राज्यपाल राष्ट्रपति शासन तक की सिफारिशें हो जाती हैं तो पेपर लीक जैसी ‘भविष्यखोर’ घटनाओं पर तेरा राज्य-मेरा राज्य क्यों? केंद्र सरकार यदि राज्यों से जवाब मांगेगी तो विपक्षी दलों के पक्षपात की भी कलई खुलेगी।
विपक्ष शासित राज्यों को लेकर छात्रों से सवाल पूछना सिर्फ एक राजनीतिक तिकड़म है। ऐसी कोई आपराधिक घटना नहीं है जिस पर राजनीतिक दलों का पक्षपाती रवैया सामने न आया हो। बलात्कार जैसे बर्बर मामलों में भी पार्टियां पक्षपाती हो जाती हैं। बीजेपी का नेता फंसे तो कांग्रेसी मुखर हो जाते हैं और कांग्रेस नेता फंसे तो बीजेपी वाले सीना ठोककर खड़े होते हैं। लेकिन अपने-अपने नेताओं पर उठते सवालों पर भाग खड़े होते हैं। इसलिए छात्रों से झारखंड या पंजाब में जाकर प्रदर्शन करने की बात दरअसल कुतर्क की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
अब सवाल है विपक्ष का। विपक्ष संसद में हंगामे के लिए अक्सर मनमोहन सिंह सरकार के दौरान तत्कालीन विपक्ष के हंगामे का उदाहरण देता है। यह भी कहा जाता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है। तर्क ठीक है, लेकिन क्या जो काम पहले होता आया है, वही होता रहे यह जरूरी है? यदि तत्कालीन विपक्ष हंगामा करता था तो अब के विपक्ष को संसद ठप करने का लायसेंस मिल गया है? प्रधानमंत्री संसद नहीं आ रहे हैं, यह बात हर मंच से कहिए, उनकी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठाइए, लेकिन संसद में जो बिल पास हो रहे हैं, कम से कम उन पर चर्चा तो होनी चाहिए ताकि लोगों को पता चल सके कि उनके लिए क्या कानून बनाए जा रहे हैं? सरकार यदि कुछ गलत कर रही है तो उसकी बात जनता के बीच ले जाइए, संसद को बंधक बनाने से क्या लाभ? संसद की गरिमा और उसका औचित्य बनाए रखना सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। (विवेकानंद-विनायक फीचर्स)



