गुरु नानक देवजी ने जगत को उपदेश दिया कि मनुष्य को अपने शरीर के प्रत्येक अंग.प्रत्यंग को परमात्मा की सेवा व
सत्कर्म में लगाना चाहिए। जिससे उनका शरीर.मन पवित्र होकर जन्म सार्थक होगा। भरीअै मति पापा कै संगि ओहु
धोपै नावै के रंगि।। अर्थात यह मनुष्य मन पापों की मैल से भरा हुआ है जो परमात्मा के नाम सिमरन से धुलकर
शुद्ध.पवित्र होगा। इस संदर्भ में एक साखी इस प्रकार आती है.
श्री गुरु नानक देवजी महाराज भाई बाला और मरदाना के साथ जगत का उद्धार करते.करते जगन्नाथपुरी पहुंचे व
वहां उन्होंने समुद्र के किनारे डेरा लगाया। भाई मरदाने ने रबाब बजाया और गुरुजी परमात्मा की स्तुति में लीन हो
गए। उस जगह थोड़ी ही दूर एक मृत शरीर पड़ा था। तब मरदाने ने देखा कि एक भूखा.प्यासा बाघ उस मुर्दे को खाने के
लिए नजदीक आया और उसे सूंघकर वापस चला गया। भूख से व्याकुल बाघ दूसरी बार फिर से आकर मुर्दे के सारे
अंगों को सूंघा परंतु बिना खाकर ही वापस मुड़ गया।
यह देख भाई मरदाना बहुत हैरान हो गया व जिज्ञासा वश गुरुजी से विनती की कि महाराज ! आप अंतर्यामी हैं मुर्दा
बाघ का भोजन है परंतु यह पास आकर सारे अंगों को संूघकरए बिना खाकर ही चला गया। इसका क्या कारण है
गुरुजी ने कहा मरदाना। हमने जो निरंकार की वाणी.कीर्तन गाया है उसे सुनकर बाघ का हृदय शुद्ध हो गया है और
इसे पता चल गया है कि यह मुर्दा बड़ा पापी है। बाघ ने पहले इसके पैरों को सूंघा और उसे पता लगा कि यह कभी पैरों
से चलकर सत्संग में नहीं गया है कभी हाथों से सेवा नहीं की आँखों से कभी संतों का दर्शन नहीं किया है रसना से
कभी हरिजस नहीं गाया और कभी अपना सिर गुरु चरणों में नहीं झुकाया है। इस तरह इसके सारे अंगों को अपवित्र
जानकर इसे नहीं खाया क्योंकि उसे निरंकार की वाणी सुनकर ज्ञान आ गया कि इस पापी को खाकर मैं भी अपवित्र हो
जाऊंगा। अत: प्रत्येक जीव को परमात्मा से जुड़कर सत्कर्म व सेवा करनी चाहिए।
गुरु नानकदेवजी का जन्म विक्रम संवत् 1526 कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी के दिन तलवंडी गांव
;पाकिस्तान में हुआ। ऐसे महान गुरु श्री गुरु नानक देवजी की 554 वीं जयंती पर शत्.शत् नमन।
श्री गुरु नानकदेव जी जगत का कल्याण करते हुए 1565 विक्रमीए 1508 ईसवी में नैनीताल और पीलीभीत के भयानक
जंगलों में पहुंचे। यह स्थान पहले गोरखमता के नाम से जाना जाता था जो कि सिद्धों जोगियों का सिखलाई केंद्र था।
योगी सर्दी की ऋतु में पहाड़ों के नीचे जंगलों में आकर इस स्थान पर योग साधना करते थे।

गुरुजी इस स्थान पर पहुंचकर लंबे समय से सूखे पीपल के वृक्ष के नीचे आकर बैठ गए। गुरुजी के पवित्र चरण पडऩे से
वह सूखा पीपल हरा.भरा हो गया। गुरुजी की यह महिमा देखकर सभी योगी बहुत चकित हो गए और गुरुजी को
महापुरुष जानकर चर्चाएं करने लगे।
गुरुद्वारा दूध वाला कुंआ. योगी शंभूनाथ श्री गुरु नानकदेवजी के पास आकर हाथ जोड़कर कहने लगा हे गुरुजी आप
मेरा तूंबा ;बर्तन दूध से भर दें। वहीं निकट एक कुंआ था। गुरुजी ने कुंए से पानी का बर्तन भर दिया जो गुरु की कृपा
दृष्टि से उन्हें दूध नजर आया और सभी ने पिया। उस स्थान को दूध वाला कुंआ कहते हैं।
फउड़ी गंगा. सिद्ध गुरु नानक देवजी महाराज से कहने लगे कि पूरबी के त्यौहार का समय आया है। आप अपनी कृपा
दृष्टि से गंगा को यहां मंगवाओ ताकि सभी यहां गंगा स्नान करें। गुरुजी ने भाई मरदाने को एक छड़ी दी और कहा
जाओ और गंगा जी के पास जाकर उसे छुआकर एक लकीर खींचते आना। पीछे मुड़कर नहीं देखना गंगाजी तुम्हारे
पीछे चली आएंगी। गुरुजी का हुकुम मानकर भाई मरदाना गंगाजी के तट पर पहुंचा और गंगाजी को लकड़ी छुआकर
लकीर खींचता आता गया। गुरुजी के नजदीक आकर भाई मरदाने ने सोचा कि देखूं तो सही कि मेरे पीछे गंगाजी आ
भी रही हैं कि नहीं। जैसे ही भाई मरदाने ने पीछे मुड़कर देखा तो गंगाजी वहीं रुक गईं आगे नहीं बढ़ीं गंगाजी पीछे ही
रह गईं। जब भाई मरदाना गुरुजी के पास आया तो गुरुजी ने कहा गंगा आगे क्यों नहीं आई तब भाई मरदाने ने कहा
आपके मना करने के बाद भी मैंने पीछे मुड़कर देख लिया तो गंगाजी वहीं रुक गईं आगे नहीं आईं। गुरुजी ने सिद्ध
योगियों से कहा इतनी दूर मरदाना गंगा ले आया है अब आप अपनी शक्ति द्वारा गंगाजी को आगे ले आओ। लेकिन
अनेक जोर लगाने पर भी गंगा जी वहां से आगे नहीं आईं। उसी जगह पर अब फउड़ी गंगा के नाम पर सुंदर बाउली
सुशोभित है।

गुरुद्वारा भंडारा साहिब. इतिहास में जिक्र आता है कि सिद्धों ने गुरुजी के पास आकर छत्तीस प्रकार के भोजन खाने
की मांग की। गुरुजी उस समय वट के पेड़ के नीचे बैठे थे। गुरुजी ने भाई मरदाने से कहा सिद्धों को भोजन खिलाओ
इस वट के पेड़ पर चढ़कर इसे हिलाओ। गुरुजी का हुकुम पाकर भाई मरदाना पेड़ पर चढ़कर पेड़ को हिलाने लगा।
मरदाने ने गुरुजी का हुकुम मानकर वैसा ही किया। वट के पेड़ से छत्तीस प्रकार से भोजन गिरने लगे। जिसे सिद्धों ने
खाकर अपनी भूख मिटाई।
सिद्धों का तिल भेंट करना. सिद्धों ने गुरुजी के आगे तिल भेंट कर कहा कि आप इसे सभी में बांट दें। सिद्धों ने
अपनी योगशक्ति द्वारा कुंओं का पानी सोख लिया। गुरुजी ने अपनी गंगा को आवाज दिया जो तत्काल हाजिर हो
गई। उसमें से पानी का कमंडल भरकर तिल घोटकर सभी को पिला दिया।
सिद्धों का गढ्ढा ;भौराद्ध खोदना. सिद्धों ने आपस में षडय़ंत्र रचकर धरती में गढ्ढा खोदकर उसमें एक बच्चे को
छिपाकर ऊपर से धरती को बराबर कर दियाए ढांक दिया और बच्चे को सिखा दिया जब हम पूछेंगे कि धरती तुम

किसकी हो  तुम कहना गोरख की धरती हूं। फिर सिद्ध आकर गुरुजी से कहने लगे यह स्थान सदियों से गोरखमता
कहलाता है। यह भूमि सिद्धों की है। आपके लिए यहां कोई स्थान नहीं है। गुरुजी हंसकर कहने लगे यह सारी भूमि तो
उस परमेश्वर की हैए तुम कबसे इसके मालिक हो गए हो  सिद्धों ने उत्तर दिया. महाराज धरती को आवाज देकर पूछ
लें कि वह किसकी है जिसे धरती माता मान्यता देगी वो ही यहां रहेगा। दूसरा यहां से चला जाएगा। गुरुजी ने कहा
ठीक है हमें आपका निर्णय मंजूर है। सिद्धों ने जोर से आवाज देकर पूछा कि धरती तुम किसकी हो। तो धरती से
आवाज आई कि मैं गोरख की धरती हूं। दो बार आवाज देने पर इसी तरह की आवाज धरती से आती रही क्योंकि गढ्ढे
के अंदर से बालक बोल रहा था। जब तीसरी बार आवाज लगाई कि हे धरती तुम किसकी हो  उस समय गुरु
नानकदेवजी ने अपना पवित्र चरण जहां धरती में बालक छिपाया था वहां लगा दिया। और कहा तू अभी भी बोले जा
रहा है। बालक वहीं शांत हो गया और धरती से बहुत ऊंची आवाज में नाद हुआ कि मैं नानक की धरती हूं। नानकमता
नानकमता नानकमता धरती से आवाज आई। सिद्ध योगी इक्कठे होकर गुरु नानकदेवजी के चरणों पर नमस्कार
कर कहने लगे कि आज से यह स्थान नानकमता है। सिद्ध गुरु नानकदेवजी के पास आकर कहने लगे कि जो बालक
धरती में शांत हो गया है उसे पुन: जीवित करें। गुरुजी ने अपने पैर की खड़ाऊ बच्चे के सिर पर लगाई और वह धनगुरु
नानकए धनगुरु नानक कहते हुए उठ खड़ा हुआ। ;माधवदास ममतानी . विभूति फीचर्स