महिला जगत


कविता जी जीवन की सांध्य बेला तक आते-आते भी इतनी भावुक बनी रहीं कि दोनों बहुओं में से कोई भी जब चाहे, जाने अनजाने कही गई कटुक्तियों से उनका दिल छलनी कर देती। आंसुओं ने जैसे उनकी आंखों को अपना परमानेंट रेसीडेंस बना लिया था। पति लाख समझाते अपने को एजर्ट करना सीखो। मगर कविताजी करें तो क्या करें। वह हैं ही ऐसी व सबका भला सोचने वाली एक नेक महिला।
भला बनना, नेक होना ठीक है मगर स्वयं को कमजोर बनाना उचित नहीं। कविताजी के केस में अगर हम उनका विगत देखें तो उन्हें घर में हिटलर पिता के शासन में इतना दबाकर रखा गया कि वे हीन भावना से ग्रस्त रहने लगी। मां स्वयं भीरू थी चूंकि उन्हें भी इसी तरह दबाया गया था।
यह अच्छी बात है कि आज की नारी में आत्मविश्वास बढ़ा है, उसे खुद पर भरोसा है और वह कहीं से कमजोर नहीं आर्थिक स्वतंत्रता ने उसे मजबूती प्रदान की है। वह अपने लिए जीना भी सीख चुकी है।
कुदरत ने उसे पुरूष से ज्यादा संवेदनशील बनाया है। दया, ममता, करूणा, प्रेम, वफादारी जैसे गुणों से उसे नवाजा है। इन्हीं गुणों के कारण आज दुनिया चल रही है लेकिन ये ही गुण कई बार नारी को कमजोर बना देते हैं। कहते भी हैं कि दया का गलत जगह दिखाना आपको मुश्किल में डाल सकता है। अंधी ममता में आपका सर्वस्व लुट सकता है, प्रेम, वफादारी के नाम पर आपका शोषण हो सकता है। नारी स्वयं डॉमिनेट होना चाहती है यह एक मनोवैज्ञानिक सच है लेकिन यह भी सच है कि जहां उसकी अपनी रजामंदी शामिल हो प्रेम से डॉमिनेट होना उसे अच्छा लग सकता है गुस्से या हिटलरशाही से नहीं।
गांधी और बुद्घ सभी ने कहा है कि अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला बड़ा दोषी है। कमजोर होना कायरता का प्रतीक है। अगर आप अपने को कमजोर मानकर भली बनती हैं तो वह आपकी मजबूरी कहलायेगी चरित्रगत गुण नहीं।
याद रखें कमजोर को हर कोई दबाता है। क्या घर परिवार के लोग, क्या पड़ोसी, जान पहचान वाले हर कोई कहीं भी आपको बेमतलब डाउन करने में लग जाता है क्योंकि, अपने को सुपीरियर दिखाना मानवीय फितरत है। अपने को असेस करना, आपका अपना काम है। उसके लिए जरूरी है आत्मचिंतन, स्वयं पर विश्वास। आप कितनी भी काबिल हों लोगों का आपसे स्वार्थ सिद्घ होता है तभी वे आपकी चमचागिरी करेंगे। जहां देखेंगे अब आप उनके कोई काम नहीं आ सकती तो या तो मतलब नहीं रखेंगे और यह लगने पर कि आप रिसीविंग एंड पर है कन्नी काटने लगेंगे। ये जग की रीत है। एक अनजाने भय को लेकर असुरक्षा का भाव मन में न पनपने दें। कल किसने देखा है। क्या जरूरी है कि आप ही को सबकी मदद की जरूरत पड़ती रहेगी। उन्हेंं नहीं। हमेशा डर कर जीना, जीना नहीं होता। कहते हैं न बहादुर एक बार मरता है मगर कायर रोज-रोज मरता है। आजकल शारीरिक रूप से बाधित लोग अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और मनोबल से वह कार्य कर रहे हैं जो सब लोग सोच नहीं पाते। उनसे प्रेरणा लें। हर स्वस्थ व्यक्ति चाहे वह पुरूष हो या स्त्री उसमें असीम शक्ति होती है जरूरत है उसे पहचानने की।
इसे दर्शाने के लिए न बड़बोलेपन की जरूरत है न शो ऑफ करने की। विनम्र होना अच्छी बात है इससे बिगड़ते काम संवरते हैं। समाज के लोगों में अच्छी इमेज बनती है। लेकिन साथ ही ध्यान रहे कि आपकी विनम्रता को लोग आपकी कमजोरी न मान बैठें। खासकर आपके मातहत कार्य करने वाले। वैसे तो आपका व्यक्तित्व अपनी मौनता में ही मुखर होता है। कई बार चुप्पी का रौब बोलने से ज्यादा होता है। रौबदार होना न बुरा होना है न कू्रर। इसी तरह लिजलिजे, ढुलमुल, कमजोर व्यक्तित्व वाली नारी भली होती है क्योंकि वह सबमिसिव हर एक की हां में हां मिलाने वाली होती है यह भी भ्रम है। हालांकि, ज्यादातर लोग ऐसी ही नारी को पसंद करते हैं। उसके साथ मेलजोल बढ़ाने में उन्हें देर नहीं लगती। वह ज्यादा सोशल बन जाती है क्योंकि वह सबको खुश करना जानती है। ‘दोस्त नादां हो तो दुश्मन से बुरा होता हैÓ। लोग इस सीख पर कम ही ध्यान देते हैं वे बाह्यï रूप को ही महत्व देते हैं। नेक होना इंसान होने की पहचान है। नेकी पर ही आज समाज का अस्तित्व टिका है वर्ना सब कुछ कब का तहस-नहस हो चुका होता। भलाई के जज़्बे की ही आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरत है। औरत चूंकि मां है जननी है। भलाई का दारोमदार उस पर ज्यादा है स्वयं भली होने पर ही वह अपने बच्चों को भलाई का पाठ पढ़ा सकती है। आज दुख की बात यह है कि आधुनिक नारी भलाई को कमजोरी का पर्याय मान बैठी है। भली स्त्री उन्हें परम्परावादी, बैकवर्ड, आउटडेटेड लगती है जबकि एक मुकम्मल वैंप उनके हिसाब से आधुनिक नारी है। महज अपने लिए सोचना, हर समय अपनी स्वतंत्रता की दुहाई देते केवल मनमानी करना सिर्फ उन्हें दिशाहीन कर रहा है। इसमें क्या वह संतुष्टि है जो एक परिवार की धुरी होने में है?
‘नारी सशक्तीकरणÓ ‘नारी स्वतंत्रताÓ जैसी नारेबाजी बहुत हुई। ऐसा न हो कि अपने को सुपीरियर दिखाने के फेर में नारी न घर की रहे न घाट की। अन्याय का विरोध करते करते वह स्वयं कहीं अन्याय करने पर उतारू न हो जाए चाहे अनजाने ही में क्यों न सही। (विनायक फीचर्स)