
उमेश कुमार साहू
दिवसवार देवी पूजन श्लोक
प्रथम- शैलपुत्री
वान्छित लाभाय, चन्द्राद्र्घ कृत- शेखराम्ï।
वृषारूढ़ाम शूल धराम शैल पुत्रीम यशस्विनीम॥
द्घितीय- ब्रह्मïचारिणी
दधाना कर पद्ïभाभ्यामक्ष माला कमण्डलू।
देवि प्रसीदितुमयी, ब्रह्मïचारिणी नुत्तमा॥
तृतीय- चंद्रघंटा
पिण्डन-प्रवरारू ढाम, चण्डको पास्त्रकैर्युता।
प्रसादम तनुते, चंद्रघंटेति विश्रुता॥
चतुर्थ- कुष्माण्डा
सुरा-संपूर्ण कलशम्ï रूधिरा प्लुतमेव च।
दधाना हस्त पद्ïमाभ्याम, कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥
पंचम- स्कंदमाता
सिंहासन गता नित्यम, पद्ïमाश्रित करद्घया।
शुभदास्तु सदा देवि, स्कंद माता यशस्विनीम्ï।
षष्टïम- कात्यायनी
चंद्रहासोज्ज्वकरा, शार्दूल वर वाहना।
कात्यायनी शुभ वधादु, देवि दानवधातिनी॥
सप्तम- कालरात्रि
एक वेणी जमा- कर्ण पूरा, नग्रा स्वरास्थिता।
लम्बोष्ठिï कर्णिका कर्णी, तैलाश्यक्त शरीरिणी॥
अष्टम महागौरी
श्वेते वृषे समारूढा, श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभम दधानु, महादेव प्रमोददा॥
नवम्ï- सिद्घिदात्री
सिद्घ गंधर्व यक्षाधेर सुरैरमरैरपि।
सैव्यमाना सदा भूयात, सिद्घिदा सिद्घिदायिनी।
चैत्र प्रतिपदा से आरंभ होने वाले नवरात्र वासंतिक तथा अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाले शारदीय नवरात्र होते हैं। दोनों में समान रूप से देवी का व्रत एवं पूजा की जाती है।
कथा- एक बार देवताओं और असुरों में युद्घ छिडा। देवताओं के स्वामी इंद्र थे तथा असुरों के महिषासुर। महिषासुर देवताओं को पराजित करके स्वर्ग का राजा बन बैठा। पराजित देवता भगवान शंकर तथा विष्णुजी के पास पहुंचे और सारा हाल सुनाया। तब शंकर तथा विष्णु को असुरों पर बहुत क्रोध आया। उनके शरीर से भारी तेज प्रकट हुआ, जिसने नारी का रूप धारण कर लिया। देवताओं ने उसकी पूजा करके अपने शस्त्र अर्पित कर दिए। इस देवी ने जोर से अट्ïटाहास किया, जिससे संसार में हलचल फैल गई। दैत्यों के सैन्यदल सुसज्जित होकर उठ खडे हुए। महिषासुर दैत्य सेना सहित देवी के सिंहनाद की ओर बढा। देवी पर उसने आक्रमण कर दिया और देवी के हाथों मारा गया। यही देवी फिर शुम्भ तथा निशुम्भ का वध करने के लिये गौरी देवी के शरीर से प्रकट हुई थी। शुम्भ तथा निशुम्भ के सेवकों ने मधुर रूप धारण करने वाली भगवती को देखकर स्वामी से कहा- महाराज दिव्य क्रांति युक्त इस देवी को ग्रहण कीजिए। कारण कि सारे रत्न आपके ही घर में शोभा पाते हैं। स्त्री रत्न रूपी इस देवी का आपके अधिकार में होना जरूरी है। दैत्यराज शुम्भ ने भगवती के पास विवाह प्रस्ताव भेजा। देवी ने प्रस्ताव को ठुकराकर आदेश दिया कि जो मुझसे युद्घ में जीत जाएगा, मैं उसी का वरण करूंगी। कुपित होकर शुंभ ने देवी पर आक्रमण कर दिया, लेकिन देवी के हाथों उसके कई सैनिक मारे गए। फिर निशुंभ पर भी देवी विकराल रूप धारण करके टूट पड़ी और असुर सैन्यदल को कुछ ही क्षणों में रौंद डाला। देवी ने वहीं चंड-मुंड को भी अपनी तलवार लेकर हूं शब्द के उच्चारण से मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार अपराजित देवी ने महादेव जी की आज्ञा से दैत्यों का नाश कर दिया, लेकिन फिर कुछ दैत्यों ने आक्रमण कर दिया। देवी ने धनुष की टंकार करके दैत्यों के अस्त्र-शस्त्रों को काट डाला। जब अनेक दैत्य हार गए, तो महादैत्य रक्तबीज युद्घ के लिए आगे बढा। वह अपने हाथ में गदा लेकर इंद्र शक्ति से युद्घ करने लगा। वज्र के प्रहार से उसके शरीर से रक्त बहने लगा तथा उसमें से उसी के समान पराक्रमी दैत्य पैदा होकर युद्घ करने लगे। देवी शक्तियों के प्रहार से इन दैत्यों के शरीर से ज्यों-ज्यों रक्त टपकता, त्यों-त्यों उन्हीं के समान पराक्रमी दैत्य पैदा होते जाते, जिनसे जगत में भय व्याप्त हो गया। देवता भी भयभीत हो गए।
देवताओं को भयभीत देखकर चंडिका ने काली से कहा- चामुंडा। तुम अपना मुख और भी फैलाओं। मेरे शस्त्र प्रहार से गिरने वाले रक्त बिन्दुओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले दैत्यों का भक्षण करती हुई रणभूमि में विचरण करती रहो। इस प्रकार उस दैत्य का रक्त क्षीण हो जाने से वह स्वयं नष्टï हो जाएगा। इस प्रकार नए दैत्य भी उत्पन्न नहीं होंगे।
इतना कहकर चंडिका ने शूल से रक्तबीज पर प्रहार किया और काली ने उसका रक्त अपने मुंह में ले लिया।
इस प्रकार शस्त्रों की बौछार से देवी ने रक्तबीज का प्राणांत कर डाला। रक्तबीज के बध का समाचार पाकर शुंभ-निशुंभ के क्रोध की सीमा न रही। वे दोनों महाशक्ति का सामना करने के लिए चल पडे। महापराक्रमी शुंभ भी अपनी सेना सहित युद्घ करने के लिए आ पहुंचा। दैत्य लडते-लडते मारे गए। संसार में शांति हुई और देवतागण प्रसन्न होकर देवी की स्तुति करने लगे। (विनायक फीचर्स)


