बटुक चतुर्वेदी
उसने ज्यों ही कूं-कूं की ध्वनि मुंह से निकाली, बिल्लू ने उसका मुंह अपने हाथ से बंद कर उसे अपनी रजाई में छिपा लिया। रजाई में पहुंचते ही उसकी कूं-कूं बंद हो गई। शायद ठंड के कारण ही वह चीख रहा था। दिन में बिल्लू जब कुत्ते के बच्चे को लेकर आया था, तभी मां ने उसे झिड़का था- जा छोड़कर आ इसे। कहीं इतना छोटा बच्चा बिना मां के पलता है? मर गया तो व्यर्थ की हत्या लगेगी। इस पर बिल्लू मचलकर मां से बोला- मां, देख तो कितना प्यारा लग रहा है। अभी पूरी तरह आंखें भी नहीं खुलीं। बिल्कुल सफेद बगुले जैसा रंग, नये पत्ते की तरह मुलायम, छोटे कान और बीस नाखून। बीस नाखून वाला कुत्ता बड़ा बहादुर और वफादार होता है। मैं इसे पालूंगा मां।
मां ने बहुत समझाया मगर बिल्लू भी एक नम्बर का जिद्दी है। जब नहीं माना तो मां ने अपना अंतिम तीर छोड़ा- मैं नहीं जानती, तुम्हारे बापू को कुत्ते-वुत्ते कतई पसंद नहीं हैं। देखते ही आगबबूला हो उठेंगे, अगर तुम्हें मार पड़ी तो मैं बचाने नहीं आऊंगी, समझे मगर बिल्लू बापू की मार से भी नहीं डरा। उसे गोद में उठाकर कलेजे से लगाकर बोला- ऐसे प्यारे बच्चे को देखकर भला किसे प्यार नहीं आयेगा? बापू जरूर इसे पालने के लिए तैयार हो जायेंगे।
मां उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनकर मंद-मंद मुस्करा रही थी। बोली- इसे कुछ खिलाया-पिलाया भी? इस पर बिल्लू ने गर्दन हिला दी तो वे किचिन में गईं और एक कटोरी में दूध लाकर रख दिया। बिल्लू ने बच्चे का मुंह कटोरी में डाला मगर उसे कटोरी से दूध पीना कहां आता था! मां बोली- ठहर अभी रुई लेकर आती हूं। मां रुई लाई और बिल्लू को समझाया कि रुई दूध में भिगोकर उसके मुंह में निचोड़ मगर बिल्लू को इतना भी नहीं आता था। मां मेरी ओर देखने लगीं, बोलीं- मुझे कभी भी कुत्ते से प्यार नहीं रहा।
पता नहीं क्यों शुरू से ही मैं कुत्ते से नफरत करती रही हूं। मैंने मुंह फेर लिया तो मां ने उसे बड़े प्यार से बैठाया और रुई भिगो-भिगोकर उसके मुंह में निचोडऩे लगीं। बच्चा मुंह से चपचप करता और दोनों अगले पैर चलाता दूध पीने को। मां की आंखें उस समय देखने योग्य थीं। बिल्लू यह सारी प्रक्रिया मनोयोग से देख रहा था। जब दूध पी चुका तो बिल्लू बोला- मां, मैंने इसका नाम बहादुर रखा है, ठीक है न? इस पर मां बोली- नाम-वाम तो बाद में रख लेंगे। पहले रात में इसे सुलाने का इन्तजाम कर वरना सर्दी में यह मर जायेगा। उन्होंने चीड़ के एक खोखे की ओर इशारा करके कहा, इसमें पुराने कपड़े बिछाये देती हूं। ओढऩे को पुराने कम्बल का टुकड़ा काफी है और एक कटोरी में दूध, बस।
‘मगर मां, अगर बापू ने इसे घर से निकाल दिया तो बिना मां का ये बेचारा रात को सर्दी में कहां भटकेगा? किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो?Ó बिल्लू बोला?
‘हां यह तो मैं भूल ही गई थी। अच्छा सुन, जब तेरे बापू घर में आयें, तू इसे लेकर बाहर ही रहना। मैं उन्हें मना लूंगी, समझे! ….Ó मां ने समझाकर कहा। मां की बात सुनकर बिल्लू बहुत खुश हुआ।
शाम को बापू घर आये तो बिल्लू, बहादुर को लेकर दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गया। बापू ने आकर हाथ-मुंह धोये, आराम किया और खाना खाकर अपने कमरे में चले गये। मां दरवाजे पर पहुंची और बिल्लू को घर में आने का इशारा किया। बिल्लू ने आते ही मां के चेहरे पर प्रश्नसूचक दृष्टि डाली तो मां ने उसे इशारे से बहादुर को खोखे में रख देने को कहा। वह उसे खोखे में रख आया तो मां ने उसे हाथ-मुंह धोकर खाना खाने को कहा। इस पर बिल्लू ने बहादुर की तरफ इशारा करके कहा- उसे खाना? इस पर मां मुस्कराकर पुन: किचिन में गई और एक कटोरी में दूध तथा रुई का टुकड़ा लाकर उसे पकड़ा दिया। बिल्लू खोखे के पास गया, बहादुर को उठाकर गोद में लिटाया और बड़े प्यार से रुई दूध में भिगो-भिगोकर उसके मुंह में निचोडऩे लगा। जब वह दूध पी चुका तो उसे फिर खोखे में सुला दिया। हाथ-मुंह धोकर बिल्लू ने अपना खाना, खाना शुरू किया मगर दृष्टि खोखे पर ही जमी रही। इस पर मां ने झिड़का- ‘खाना तो मन लगाकर खा ले।Ó
बापू सो गये तो मां, बिल्लू के पास आकर लेट गई। बिल्लू और मां अभी जाग रहे थे। बिल्लू ने मां के गले में हाथ डालकर धीरे से पूछा- मां, बापू मान गये न? मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- चल हट पगले! तेरे लिए कितने पापड़ बेलने पड़़ते हैं। बड़ी मुश्किल से राजी हुए बहादुर को पालने के लिए। इस पर बिल्लू ने मां की छाती पर अपना सिर टिका लिया।
सुबह जब बिल्लू की नींद खुली तो बापू ने पुकारा- बिल्लू बेटे, आज स्कूल नहीं जाना? मगर बिल्लू तो गहरी नींद में था, कैसे सुनता बापू की आवाज? शायद रातभर वह बहादुर के लिए जागता रहा था। जब बापू की आवाजों पर वह नहीं जागा तो मां लपककर आई और बिल्लू की रजाई खींचकर बोली- बिल्लू… ओ बिल्लू… स्कूल नहीं जाना क्या? इस पर बिल्लू ने करवट बदली। उसके करवट बदलते ही बहादुर की कूं-कूं सुनाई पड़ी। मां ने रजाई हटाकर देखा तो बिल्लू के नीचे बहादुर की टांग दबी पाई। कूं…कूं सुनकर बिल्लू भी जाग पड़ा। धीरे से बोला- मां, रात को इसे सर्दी लग रही थी। यह रो रहा था। मुझसे इसका रोना नहीं देखा गया, इसीलिये मैं इसे उठाकर अपने पास ले आया… तभी बापू आ गये- अच्छा,. तो ये रहे बहादुर साहब! मां ने उसे उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा- देखो तो कितना प्यारा बच्चा है। बगुले-सा सफेद रंग, शेर जैसा मुंह और बीस नाखून। मुझे तो यह किसी अच्छी विदेशी नस्ल का कुत्ता लगता है। बिल्लू से एक ही दिन में बड़ा हिल-मिल गया है। मां इतना सब इस हड़बड़ाहट में कह रही थी कि बिस्तर में कुत्ते के बच्चे को सुलाने पर कहीं बापू नाराज न हो बैठें? मगर बापू का स्नेह बहादुर पर ऐसा उमड़ा कि पूछो मत। उन्होंने उसे गोद में बैठाकर प्यार से थपकियां दीं, पुचकारा। बहादुर प्यार से उनके हाथ चाटने लगा। तो बोले- लो भई, इसे कुछ खिलाओ-पिलाओ, भूखा है, बेचारा।
अभी तक घर में सिर्फ चार सदस्य थे- मैं, बिल्लू, मां और बापू। मगर अब पांच हो गये थे। यानी बहादुर भी हमारे घर का सदस्य बन चुका था। मेरे अलावा सभी तीन सदस्य नन्हें बहादुर का बड़ा ख्याल रखते थे। बापू दफ्तर जाते हुए कहते- भाई मैं दफ्तर जा रहा हूं, जरा बहादुर का ध्यान रखना। दूध वगैरह पिला देना और देखना कहीं घर से बाहर न निकले।
बिल्लू स्कूल से पहले बहादुर को दूध पिलाता और उसे प्यार से समझाता- अच्छा बहादुर, मैं स्कूल जा रहा हूं, तू ऊधम मत करना। घर से बाहर निकलने की कोशिश मत करना वरना पकडऩे वाले तुझे पकड़ ले जायेंगे। अच्छा बहादुर टा…टा।
मां कभी घर से बाहर जातीं तो बहादुर को कमरे में बंद करके कहतीं- बहादुर, तू घर पर ही रहना, मैं अभी आई, देख शोर मत करना, समझे!
बापू दफ्तर से आते ही बहादुर की खैरियत पूछते। बिल्लू स्कूल से लौटता तो पहले बहादुर से दो बातें करता। मां बाहर से लौटती तो पहले बहादुर को कमरे से बाहर निकाल प्यार की थपकी देती। एकमात्र मैं ही ऐसी थी, जिसे बहादुर से कोई लगाव नहीं था। अब वह नन्हा बहादुर इतना समझने लगा था कि अगर उसका नाम पुकारते तो वह पूंछ हिलाने लगता। गेंद फेंकते तो उसके पीछे भागता। कोई कर्कश आवाज मोटर या स्कूल बस की आती तो भोंकने लगता।
गर्मी के दिनों में एक दिन बहादुर अचानक बीमार पड़़ गया। दिनभर वह सुस्त पड़ा रहा। खाने को जो कुछ दिया, वह वैसा-का-वैसा पड़ा रहा। बिल्लू स्कूल से लौटा तो बहादुर को बीमार देख वह उदास हो गया। उसने मां से बहादुर को किसी डॉक्टर के पास ले चलने को कहा। मां शायद बिल्लू के आने का ही इन्तजार कर रही थी तुरन्त कपड़े बदलकर बहादुर को टोकरी में रखा और जानवरों के अस्पताल चल पड़ीं। डॉक्टर ने उसे देखा और दवा देकर कहा- घबराने की बात नहीं है, ज्यादा खाने से ऐसा अक्सर हो जाता है। इसे नियम से खाना खिलाइये और यह दवा दूध में घोलकर दिन में तीन बार इसके गले के नीचे उतार दीजिये। उस दिन न मां ने खाना, खाया और न बिल्लू ने। शाम को जब बापू लौटे तो बहादुर को देखकर वे भी दु:खी हो उठे। उसके पास जाकर बोले- बेटे बहादुर, क्या हुआ? पेट में दर्द है। अच्छा-अच्छा ये ले दवा पी ले। उन्होंने मां के हाथ से दूध में घुली हुई दवा ले ली और बहादुर का मुंह खोलकर दवा उसके कंठ से नीचे उतार दी। बहादुर दवा पीकर पुन: टांगों में मुंह दुबकाये, आंखें बंद कर लेट गया। बापू के मुंह से एक ठंडी आह निकल पड़ी। घुटनों पर हाथ रखकर उठते हुए बोले- इसे आराम करने दो। सुबह मैं खुद इसे अस्पताल ले जाऊंगा। उस रात बापू ने भी दो रोटी खाकर पानी पी लिया। सभी बहादुर के लिए चिन्तित थे। मां और बिल्लू की रात पलकों में गुजरी। बापू भी एक-दो बार रात में उठकर देखने आये। सुबह तक बहादुर खुद ही आंखें खोलकर कमरे में धीरे-धीरे टहलने लगा तो सभी के चेहरों पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। लगभग एक सप्ताह उसे नियमित दवा दी गई, तब जाकर वह ठीक हुआ। उसके पूर्ण स्वस्थ होने पर मां ने प्रसाद बांटा तो मुझे बड़ी हंसी आई।
दिन जाते देर नहीं लगती। देखते-ही-देखते एक साल गुजरा, दूसरा साल गुजरा और तीसरा। बहादुर अब एक पूरा स्वस्थ, सुन्दर कुत्ता बन चुका था। उसके डील-डौल को देखकर ही लोगों का दम खुश्क होता था और उसकी आवाज का तो कहना ही क्या। वह इतना वफादार था कि मजाल है कोई परिन्दा घर में पर मार जाए। नये आदमी या अजनबी को देखकर वह भोंकने लगता था मगर परिवार के किसी सदस्य के रोकने पर वह दुम हिलाकर उस आदमी के पैरों से लिपटने लगता था। दूसरे शब्दों में वह उस व्यक्ति से दोस्ती का हाथ बढ़ा देता था।
उसकी वफादारी की तो बात ही अलग थी। हम यदि यह कहकर दरवाजे में बैठ जाएं कि अभी आते हैं, जरा घर देखना तो वह तब तक द्वार पर बैठा रहता, जब तक कि घर का कोई सदस्य न आ जाए। अगर कोई आदमी भी आता वो ऐसा गुर्राता था कि वह व्यक्ति उलटे पांव भागता। और तो और अगर कोई चिडिय़ा उड़कर घर के अंदर दाखिल होती तो वह उस पर झपट पड़ता। चूहे तो उसके जानी दुश्मन थे। उनकी चूं-चूं सुनी नहीं कि वह कान खड़े करके उस ओर लपकता जिधर से वह आवाज आती। कई बार उसने भागते चूहे को पकड़कर अपने पैरों से रौंदा था।
एक दिन की घटना बताऊं। एक रिश्तेदार का लड़का हमारे घर आकर ठहरा। बहादुर ने उससे दोस्ती कर ली। वह और बिल्लू खेलते तो बहादुर भी उनमें शामिल हो जाता। एक दिन बिल्लू स्कूल गया तो उस लड़के ने बिल्लू के खिलौनों का बॉक्स खोलकर कुछ खिलौने निकालकर अपनी जेब में डाले ही थे कि बहादुर ने झट उसका हाथ मुंह में दबा लिया। लड़के का बुरा हाल। लगा चीखने। आवाज सुनकर बापू दौड़ आये, तब उन्होंने उसे छुड़ाया।
बहादुर में एक बहुत बुरी आदत थी। वह किसी का दिया हुआ कुछ नहीं खाता था। अपने घर में वह भूखा-प्यासा पड़ा रहेगा मगर पराये घर की या पराये हाथ से दी हुई कोई चीज वह नहीं खाता था। एक शादी में सारे परिवार को शहर से बाहर जाना पड़ा। बहादुर की समस्या का हल इस तरह निकाल लिया गया कि उसे पड़ोसी के यहां छोड़ देंगे। उसे पड़ोसी के यहां छोड़ सारा परिवार शादी में चला गया। तीसरे दिन हमें वहां पड़ोसी का तार मिला ‘बहादुर ऑन हंगर स्ट्राइक।Ó हम बड़े परेशान हुए औरा बारात विदा होने के बाद फौरन लौटना पड़ा। वहां देखा कि बहादुर चार दिन में ही सूखकर आधा हो गया है। उसने पड़ोसी के हाथ का पानी तक नहीं पिया, रोटी की बात तो अलग रही। हां जब प्यास असहयï हो जाती तो पब्लिक नल पर भरे गड्ढे में पानी पी आता और दरवाजे में आकर बैठ जाता। जब हम आये तो हमें देखते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह हम सब लोगों के पैरों से लिपटने लगा। बिल्लू को उसने अपनी जीभ से चांटना शुरू कर दिया। उस दिन हमें पता चला कि बहादुर भी हृदय की भाषा समझता है, उसका भी दिल है। दुर्गाेत्सव के दिन थे। हम लोग रात को देर से रामलीला देखकर आये। बहादुर घर पर बराबर रखवाली कर रहा था। हमें देखते ही पूंछ हिलाने लगा। जैसे ही बापू ने ताला खोला, वह उनकी टांगों से लिपटने लगा। दोनों अगले पैर उठाकर बिल्लू की छाती पर उसके गाल चाट लिये। मां ने डांटा तो कान पीछे मोड़, पूंछ दबाकर घर में चुपचाप चला गया। बहादुर की वजह से हम बेखटके दरवाजा खोले गहरी नींद लेते। आज भी वही हुआ। देर तक सोते रहे मगर जिस प्रकार बहादुर हर सुबह हम लोगों को आकर जगाता था, आज उसने नहीं जगाया। लगभग आठ बजे बापू की आंख खुली। धूप घर में घुस चुकी थी। उन्होंने सिरहाने रखी घड़ी उठाकर देखी- सवा आठ। उन्होंने बहादुर को आवाज लगाकर कहा- क्यों बहादुर, आज जगाना ही भूल गया? मगर हर दिन की तरह आवाज सुनते ही बहादुर दौड़कर नहीं आया, तो बापू ने ऊंची आवाज में बहादुर को पुकारा मगर वह नहीं आया। इस पर बापू सशंकित हो उठे। उन्होंने मुझे व बिल्लू को आवाज दी- बिल्लू, बेबी, देखो तो बहादुर कहां गया? बिल्लू तुरन्त उठा और घर के हर कोने में बहादुर को ढूंढऩे लगा मगर बहादुर का कहीं पता नहीं था। वह बाहर सड़क पर आया और मोहल्ले के लड़कों से बहादुर के बारे में पूछने लगा मगर वे भी ठीक-ठीक नहीं बता पाये। वह राह चलते लोगों से पूछने लगा- क्यों भाई, एक सफेद खूबसूरत प्यारा कुत्ता तो आपने नहीं देखा? राहगीर सिर हिलाकर न कह देते तो वह निराश हो उठता। वह शहर में बहादुर की खोज में निकल पड़ा। जहां कहीं भी उसे कुत्ते लडऩे या भौंकने की आवाज सुनाई पड़ती, वह बहादुर-बहादुर चिल्लाता उधर ही चल पड़ता मगर बहादुर का कोई पता नहीं लगता। निराश हो, दो-तीन घंटे बाद भरे-भरे कदम रखता घर में घुसा। उसकी आंखों में आंसू छलक रहे थे। मां दरवाजे पर बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। बापू खुद मोहल्ले में पूछताछ कर दफ्तर चले गये थे। मां का चेहरा साफ उनकी वेदना बता रहा था, फिर भी वह बिल्लू को ढाढस बंधाती बोली- घबरा मत, वह कहीं रुकने वाला नहीं, आयेगा अवश्य? मगर बिल्लू सिसकने लगा तो मां के भी आंसू निकल पड़े। आंचल से आंसू पोंछ उन्होंने बिल्लू के सिर पर हाथ फेर दिया।
उस दिन मैं, बिल्लू और मां दिनभर दरवाजे पर भूखे-प्यासे बहादुर की तरह प्रतीक्षा करते रहे। उसकी बचपन से लेकर अब तक की एक-एक घटना मां, बिल्लू और बेबी याद करते और रोने लगते। दिनभर निकल गया। शाम को बापू लौटे तो उनका चेहरा भी लटका हुआ था, फिर भी सबको धैर्य बंधाते हुए बोले- शायद हमारा उसका इतने दिनों का ही संयोग लिखा था। चलो उठो, दु:खी होने से क्या होगा। इस पर मां बोली- मेरा बहादुर जरूर आयेगा, वह किसी के हाथ का छुआ पानी तक नहीं पीता तो किसी के पास रह कैसे सकेगा? मुझे पूरा विश्वास है कि बहादुर एक दिन जरूर आयेगा। बहादुर की प्रतीक्षा हम लोग आज भी कर रहे हैं। हालांकि, उस बात को एक साल बीत गया मगर मां को अब भी विश्वास है कि बहादुर एक दिन अवश्य आयेगा। (विनायक फीचर्स)



