डॉ. वंदना गांधी
उठो, जागो और तब तक न रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुँच जाओ।
उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्नि बोधत स्वामी विवेकानंद का यह आह्वान युवाओं को प्रेरणा देता है। उठो, जागो और तब तक न रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुँच जाओ, का यह मूल मंत्र आज भी भारत के करोड़ों युवाओं को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर रहा है। यह मंत्र राष्ट्र की युवा पीढ़ी में नई चेतना, नई शक्ति और अद्भुत आत्मविश्वास का संचार करता है। स्वामी विवेकानंद के अन्य सभी विचार जो उनके समय जितने प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और युवाओं का दिशा निर्देशन कर रहे हैं। आज नवचेतना की करवट लेते भारत में हम स्वामी विवेकानंद के विचारों को आकार लेते देख रहे हैं।
वर्तमान समय भारत का अमृतकाल है। दसों दिशाओं में भारत माँ की जय-जयकार गूँज रही है। चहुँओर भारत का परचम लहरा रहा है। राष्ट्र की शक्ति, अध्यात्म, ज्ञान-परंपरा, वैज्ञानिकता, प्राचीनता, शांति, सौहार्द्र के दृष्टिकोण और विश्व बंधुत्व की भावना को पूरा विश्व जान और मान रहा है। लगभग 131 वर्ष पूर्व 1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसदÓ में जिस भारत का चित्र विश्व के समक्ष रखा था, भारत की विराटता एवं उत्कृष्टता का बोध कराया था, भारत आज उसी प्रभावशाली रूप में दुनिया भर में स्वीकारा जा रहा है। मात्र 39 वर्ष के जीवनकाल में युवा पीढ़ी के लिए हमेशा हमेशा प्रासंगिक रहने वाली कार्ययोजना देने वाले महान दृष्टा, भारत माँ को फिर से संपन्न, समृद्ध करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देने वाले राष्ट्रभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए हमेशा अतिप्रेरणादायी रहेंगे।
आज का भारत युवाओं का राष्ट्र है और भारत का भविष्य युवा ही तय करेंगे। स्वामी विवेकानंद के विचार और सम्पूर्ण जीवन युवाओं का मार्गदर्शन करने वाले एवं ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि विवेकानंद मात्र एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार हैं। वे एक प्रवाह के साथ युवाओं को स्वस्फूर्त करने की क्षमता रखते हैं। यदि इनके विचारों को युवा थोड़ा भी अपना सकें, उन पर चल सकें तो हमारे राष्ट्र में ग्लोबल लीडर्स की एक ऐसी टीम खड़ी होगी जिससे पूरा विश्व आलोकित होगा और मानवता की भलाई के लिए भारत का मार्गदर्शन पूरे विश्व को प्राप्त हो सकेगा। ऐसे में सहज प्रश्न उठता है कि विवेकानंद जी के युवा कौन हैं? क्या आयु में युवा युवा हैं? बिलकुल नहीं, बल्कि उनकी दृष्टि में ‘युवा यानी वह जो अंधेरे में भी कूदने का साहस रखता है, युवा वह है जो आह्वानों से डरता-भागता नहीं बल्कि उन्हें स्वीकारने में तत्पर रहता है, युवा वह जो अपने अस्तित्व से आसपास के लोगों का विश्वास बढ़ाता है, युवा वह जो बुजुर्गों का आधार बनता है, युवा वह है जो बिना हिसाब-किताब किए या अपनी लाभ-हानि सोचे बिना राष्ट्र के हित हेतु स्वयं को समर्पित कर देता है। युवा वह है जो किसी उद्देश्य के लिए सकारात्मक सृजनात्मक करने के लिए अपने आपको हमेशा प्रस्तुत करता है।Ó स्वामी जी का स्पष्ट रूप से मानना था कि युवाओं का जीवन सफल हो या न हो सार्थक अवश्य होना चाहिए।
युवाओं की शिक्षा पर स्वामी विवेकानंद ने बहुत ज़ोर दिया। उनके अनुसार युवाओं को शिक्षित होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ‘शिक्षा यानि कि जानकारी का पुलिंदा मात्र नहीं बल्कि शिक्षा वह है जो व्यक्तित्व निर्माण करे, चरित्र निर्माण करे, समाज निर्माण करे और जो संकटों से निपटने में उपयोगी बने, परोपकारी दृष्टिकोण प्रदान करे और सिंह सा साहस प्रदान करे।Ó शिक्षा से मानसिक पोषण प्राप्त युवाओं के शारीरिक पोषण हेतु मैदान में खेलकर शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाना भी विवेकानंद जी ने उतना ही आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि ‘युवाओं को अपने दैनिक जीवन के मार्गदर्शन के लिए गीता तो पढऩी चाहिए लेकिन साथ ही साथ मैदान में जाकर फुटबॉल भी खेलना चाहिए।Ó उनके लिए खेल भी उतना ही आवश्यक था जितनी कि शिक्षा। युवाओं में सामाजिक चेतना हो और वे समाज के कमज़ोर तबके यानी कि वंचित वर्ग के लिए कार्य करें, इस पर भी उनका ज़ोर रहा है। युवाओं को प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि ‘प्रत्येक युवक को अपने देश व संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।’ स्वामी जी ‘मनी मेकिंग की बजाय ‘मैन मैकिंग के पक्षधर थे।
यूरोप से स्वामी जी के वापस लौटते समय उनसे कहा गया कि अब आप आधुनिक देश को छोड़कर वापस अपने पिछड़े देश में जा रहे हैं तो उन्होंने उस समय कोई उत्तर ना दिया, लेकिन जैसे ही भारत भूमि पर क़दम रखे सबसे पहले उन्होंने अपने देश की मिट्टी अपने शरीर पर लगा ली और कहा कि यूरोप जाने से पहले मुझे भारत प्रिय था, पर अब वापस आने पर भारत भूमि मेरे लिए पवित्र हो गई है। यह कर भी उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि अपने देश की कमियाँ ना ढूंढें बल्कि देश की अच्छाइयों पर हमेशा गर्वित रहें, पूरी श्रद्धा रखें और दूसरों के उकसाने पर भी अपने विश्वासों और श्रद्धा में कमी ना आने दें। उन्होंने युवाओं को यह भी कहा कि ‘आप का कुछ भौतिक पा लेना ही सफलता नहीं है या आपकी हार या जीत सफलता नहीं है, बल्कि आपका परिश्रम और प्रयत्न करना ही आपकी असली सफलता है। आप जो भी कार्य हाथ में लें उसमें अपना पूरा परिश्रम लगा दें। अपने आप को पूर्ण समर्पित कर दें। यही सफलता है।
स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी सभ्यता की सराहना तो की लेकिन यह भी सिद्ध किया कि भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक धाती का कोई भी अन्य सानी नहीं है। आज भारत प्राचीनतम और आधुनिक समाधानों के बीच की खाई को पाटकर पुन: विश्वगुरु बनने के मार्ग पर पूरी ऊर्जा के साथ अग्रसर है। भारत की कालजयी शिक्षाएं आज हमारे सामने आ रही चुनौतियों के समाधान के लिए मार्ग प्रशस्त करती हैं। विवेकानंद जी के सपनों का भारत और समाज वह था ‘जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व विकसित हो और जहाँ मानव मात्र का सम्मान और स्वतंत्रता होने के साथ-साथ प्रेम सेवा और शक्ति का भाव भी हो।
अपने विचारों, आदर्शों और लक्ष्यों के लिए स्वामी विवेकानंद आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं को शारीरिक, सामाजिक बौद्धिक और आध्यात्मिक संधान के माध्यम से इन्हें प्राप्ति का मार्ग भी बताया। यदि युवा इनमें से किसी एक भी रास्ते को सच्चे प्रयासों के साथ अपना लें तो शांति और समृद्धि की प्राप्ति कर सकते हैं। आज भारत प्राचीनतम और आधुनिक समाधानों के बीच की खाई को पाटकर पुन: विश्वगुरु की भूमिका में आ रहा है। प्राचीन ज्ञान परंपरा को अपनाकर उन्हें नए परिप्रेक्ष्य में अपनाकर आज भारत ज़्यादा न्यायसंगत, विश्वसनीय, सामंजस्यपूर्ण नेतृत्व कर पूरी दुनिया का मार्ग प्रशस्त करने की स्थिति में है। भारत की कालजयी शिक्षाएं हमारे सामने आ रही चुनौतियों के समाधानों के लिए मार्ग प्रशस्त करती है। अपनी आंतरिक शांति के साथ-साथ पूरे विश्व को शांति और एकता के लिए विचार जागृत करने के लिए भारत एक वैश्विक मिशन पर चल पड़ा है।
राजनीतिक, धार्मिक विषमताओं के कारण भारत अपनी मूल संस्कृति को बिसरा सा बैठा था। भारतीय समाज अपने अतीत के गौरव को भुला बैठा था जिससे विश्व ने भी अपने मानस पटल से हमारे गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर दिया था लेकिन स्वामी विवेकानंद जी के बताए तीन और मार्ग अध्ययन, आराध्य और अध्यात्म के संयोजन से भारत पूरी ऊर्जा के साथ पुन: विश्व का सिरमौर बनने के रास्ते पर चल पड़ा है। (विनायक फीचर्स)



