अजय दीक्षित
गत 21 दिसम्बर को संसद का शीतकालीन सत्र अनिश्चत काल के लिए स्थगित हो गया। यह सत्र कई मायनों में
उल्लेखनीय रहा है। इस सत्र में कई महत्वपूर्ण बिल पारित हो गये। दण्ड संहिता से सम्बन्धित आई.पी.सी.
सी.आर.सी.पी. जैसे अंग्रेजों के काल से चले आ रहे तीन नये बिल लाये गये। गृहमंत्री ने कहा कि अंग्रेजों के बनाये ये
कानून दण्ड देने के लिए थे। गुलाम मानसिकता से छुट्टी पा कर नये बिल न्याय देने के लिए हैं। अब दण्ड संहिता की
पुरानी धाराओं के स्थान पर नयी धाराएं आ गई हैं। राजद्रोह की जगह इसे देशद्रोह किया गया है। इसी प्रकार मुख्य
चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति सम्बन्धी कमेटी की सदस्यता बदल दी गई है। अब मुख्य
न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री सदस्य होगा। यानि प्रधानमंत्री एक अन्य मंत्री और
विपक्ष का लीडर। अब निश्चय ही मनचाहा व्यक्ति नियुक्त किया जा सकेगा। यूं पहले भी नियुक्त आयुक्त कुछ
स्वतंत्र होकर कार्य करते नहीं दिखते थे।
अस्तु मुख्य बात यह है कि ये सभी महत्वपूर्ण बिल बिना बहस के पारित हो
गये क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा के 146 सदस्यों को निष्कासित कर दिया गया। इस बार संसद सचिवालय ने
निलम्बित सदस्यों को लाबी गैलरी व अपने कक्ष में जाने से भी वंचित कर दिया। मानों ये अब सांसद ही नहीं है।
कानून वेक्ता कहते हैं यह आदेश सिरे से गलत है क्योंकि निष्कासन मात्र कार्यवाही में भाग न ले सकने को कहते हैं।
संसदीय कार्य मंत्री की अनुशंसा के बाद राज्यसभा के सभापति एवं लोकसभा के अध्यक्ष ने इन 146 सदस्यों को शेष
सत्र के लिए निष्कासित कर दिया। कुछ सदस्यों का मामला प्रिविलेज कमेटी को भी भेजा गया।
मेरे अंग्रेज मित्र पत्रकार जो लंदन से छपने वाले गार्जियन और डेली टेलीग्राफ दैनिकों के लिए लिखते हैं और वे ब्रिटिश
पार्लियामेंट को कवर करते हैंए बतलाते हैं कि वहां सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष की पार्टी के सदस्यों में परस्पर सौहार्द
रहता है। संयुक्त क्रिकेट मैच होते हैंए साथ.साथ लंच होता हैए साथ.साथ पिकनिक होती है और लेबर और कंजरवेटिव
पार्टी के सदस्य एक ही कार में संसद में आते दिखलाई देते हैं। अब यह कहा जा सकता है कि यह तो गुलाम
मानसिकता वाले देश का उदाहरण हैए तो भारतीय उदाहरण में कुरुक्षेत्र युद्ध में पाण्डव शाम ढलते कौरवों के कैम्प में
जाकर भीष्म पितामह के घावों में मलहम लगाते थे।
असल में दोनों पक्षों को आत्म चिंतन की जरूरत है। यदि राज्यसभा के सभापति की नकल उतारना गलत है तो राहुल
गांधी की नकल उतारना भी गलत है। यह कहना भी गलत है कि बरसाती पहनकर नहाना तो कोई डाक्टर साहब से
पूछे। यह कटाक्ष डॉण् मनमोहन सिंह के लिए था।
कोई भी राजनैतिक दल होए उसके प्रवक्ता टीण्वीण् चैनलों में अन्य दलों को कोसते रहते हैं। बात.बात में भाजपा या
कांग्रेस या सपा या आप या टीण्एमण्सीण् के प्रवक्ता किसी भी मुद्दे का मीडिया ट्रायल करते हैं। इस पर तो सर्वोच्च
न्यायालय को रोक लगानी चाहिए क्योंकि अनेक बार न्यायालयों में लंबित केसों पर भी इनके द्वारा टिप्पणी करती
देखी जा सकती है। स्वस्थ राजनीति में पक्ष और विपक्ष एक हैं। दोनों के सहयोग से प्रजातंत्र पुष्ट होगा! ;अजय दीक्षित (विभूति फीचर्स)



