मानव जीवन में पर्व त्योहारों का महत्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य केवल रोटी पर जिंदा नहीं रह सकता। काम के अलावा
उसे मनोरंजन एवं अनुष्ठड्ढान आदि भी सुखी रहने के लिये आवश्यक हैं। भारत वर्ष पर्व एवं त्योहारों का देश है। यहां
क्षेत्र एवं मौसम के अनुसार व्रत एवं त्योहार मनाये जाते हैं। उसी शृंखला में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ पर्व मनाया
जाता है। जिसने लोकपर्व का रूप ले लिया है। क्षेत्र और भाषा के अवरोध को पार कर इस पर्व ने राष्ट्रीय और
अंतराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया है। मूलत बिहार और पूर्व उत्तर प्रदेश में प्रचलित छठव्रत का दिन.प्रतिदिन
व्यापक स्वरूप दृष्टव्य हो रहा है और शनै.शनै यह पर्व संपूर्ण भारत में लोकप्रिय हो रहा है। वास्तव में यह सूर्य की
उपासना का पर्व है। सूर्य ऊर्जा का प्रतीक है और ऊर्जा सृष्टि का आधार है। वह संपूर्ण संसार का प्रकाशक है। अत
आराध्य है। वेद में कहा गया है.
ऊँ नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे
महोदवाय तद्दतश्यं समर्पत।
दूर दृशे देव जाताय केतवे
दिवस्पुत्राय सूर्याय शंडस्त्
अर्थात् चराचर विश्व की आत्मा सूर्य को नमस्कार हो। वह विविध रूप ग्राहक चक्षु का अधिदेव मित्र का तथा विविध
रस ग्राहक रसना का अधिदेव वरुण का भी साक्षी एवं प्रकाशक है। वह महान पूज्य एवं आराध्य देव है।
इस प्रकाशपुंज दैदीप्यमान आदित्य की उपासना दीवाली के छठवें दिन शुक्ल षष्ठी को बड़ी पवित्रता के साथ की जाती
है। छठ एक लोकपर्व है। यह लोक में व्याप्त है। कार्तिक माह प्रारंभ होते ही ग्रामीण महिलाएं छठ लोकगीतों का गायन
प्रारंभ कर देती हैं।बाटहिं पूछेला बटोहिया की गूंज चारों दिशाओं में गूंजती है। इन लोकगीतों से पर्व आयोजन
के लिये एक वातावरण निर्मित होता है और फिर व्रत का दिन भी आ जाता है। नये.नये वस्त्र धारण कर नये उत्साह से
सूर्य की उपासना का पर्वए आस्था का पर्व और डूबते सूर्य की विदाई और उगते सूर्य का स्वागत अध्र्य के साथ किया
जाता है। सूर्य की उपासना का उल्लेख ऋग्वेद में है परन्तु महाभारत काल में सूर्य को सनातन ब्रह्म सबका मूल कारण
और उद्गम मान लिया गया। बाद में सूर्य संप्रदाय और वैष्णव संप्रदाय एक हो गये और मिल.जुलकर सूर्य उपासना
का पर्व मनाने लगे।
दीवाली समाप्त होते ही छठ की तैयारी प्रारंभ हो जाती है। चार दिवसीय अनुष्ठान प्रथम दिवस को कहते
हैं। इस तिथि को व्रती स्नान कर अड़वा चावल की मीठी खीर का सेवन करते हैं उसके पश्चात दूसरे दिन खरना
कहलाता है। जिस दिन व्रती दिनभर उपवास रहकर शाम को गुड़.दूध से बनी खीर खाते हैं। इस व्रत को महिला. पुरुष
दोनों करते हैंए लेकिन संख्या अधिक महिलाओं की ही होती है। तीसरे दिन आटे को घी और गुड़ में मिश्रित कर प्रसाद
तैयार किया जाता है जिसे यठकुआष् कहा जाता हैए इसके अतिरिक्त केला नीबू नारियल अदरक गन्ना और अन्य
मौसमी फल भी प्रसाद में शामिल किये जाते हैं।
इसके पश्चात पारंपरिक परिधान में अबाल वृद्ध सभी घाट की ओर प्रस्थान करते हैंए वहीं श्रद्धा से बांस निर्मित
टोकरी में प्रसाद रखकर घाट पर पहुंचते हैं। जहां नदी नहीं हैए वहां तालाब के समीप और जहां तालाब भी नहीं है वहां
कृत्रिम तालाब तैयार कर घाट तैयार किये जाते हैं पटना में गंगा नदी के किनारेए दिल्ली में यमुना नदी और मुंबई
तथा चेन्नई में समुद्र के तट पर अपार भीड़ पहुंचती है। वहां जल में खड़े होकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ डूबते सूर्य की
पूजा कर उन्हें अध्र्य दिया जाता है। उसके पश्चात सूर्यास्त होने पर सभी लोग अपने घर वापस आते हैं और घर पर
हाथी ;गणेशद्ध का पूजन किया जाता है। पूरा परिवार रतजगा करता है। चौथे दिन प्रातरू चार बजे से पुन लोग घाट पर
पहुंचते हैं। जहां उगते सूर्य की उपासना कर उन्हें अध्र्य दिया जाता है। इसके बाद यह अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है
तथा वहीं से प्रसाद वितरण प्रारंभ हो जाता है। इस व्रत में प्रसाद की पवित्रता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रसाद
तैयार करने में यह ध्यान दिया जाता है कि प्रसाद का कोई हिस्सा मशीन से तैयार न होए गैस के चूल्हे का उपयोग भी
नहीं किया जाता है। मिट्टी का चूल्हा और आम की लकड़ी जलाकर ही प्रसाद तैयार किया जाता है। ;आर.एम.पी.सिंह . विभूति फीचर्स।




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