आश्विन मास लगते ही उत्तर भारत में प्रायरू हर छोटे नगर में देवी प्रतिमाएं स्थापित करने की होड़ शुरू हो जाती है। साथ ही दशहरे के दिन स्थान.स्थान पर होने वाली राम लीलाओं में राम विजय को रेखांकित करते हुएए रावण पुतले के दहन की तैयारियां भी प्रारंभ हो जाती हैं। रामलीलाओं के कथानक का मुख्य स्रोत वाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामचरित मानस है। दक्षिण पूर्व एशिया में जहां आज इस्लाम और बौद्ध धर्म फैला हैए वहां भी डेढ़.दो हजार वर्ष पूर्व राम कथा पहुंच चुकी थी और आज भी इन्डोनेशिया के कई द्वीपों में समय के अनुसार परिवर्तित होते हुए रामलीला प्रचलित है। उत्तरभारत में आश्विन शुक्लपक्ष 10वीं को दशहरा का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इसी दिन राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी इसलिए इसे विजयदशमी भी कहा जाने लगा है। उपर्युक्त दोनों ग्रंथों का प्रभाव इस महोत्सव पर पड़ा हैए परंतु इसमें रावण दहन की परम्परा कब से प्रारंभ हुई यह खोज का विषय है। साधारणतया अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा माना जाता है।
रावण को अधर्म पर असत्य का तथा राम को धर्म और सत्य के रूप में प्रस्तुत करने वाला यह उत्सव भारत के महानगरों में विज्ञान प्रसूत संसाधनों का उपयोग करते हुए रावण दहन को आयोजन के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा देता है। कहीं.कहीं इन पुतलों की ऊंचाई 100 फीट को छूने लगी है। परम्पराओं से दृढ़तापूर्वक बंधा समाज यह मानने तो क्या सुनने को तैयार नहीं होगा कि जिस रावण का हम दहन कर रहे हैं। वह असत्य और अधर्म का प्रतीक होने के साथ.साथ सनातन आर्यधर्म का अध्येता ही नहींए एक प्रकांड विद्वानए तपस्वी याज्ञिक और वैज्ञानिक भी था। यदि हम अपने धर्म ग्रंथों में लिखी हर बात को शब्दशरू ग्रहण करते हैंए उसके लक्षणार्थ और व्यंजकार्थ में नहीं जाते तो इन्हीं दोनों रामायणों के अनुसार राक्षसराज रावण ऋषि संतानए वेदज्ञए तपस्वीए पंडितए राजनीतिज्ञए पराक्रमीए विजेताए वैभवशालीए ब्राह्मण सिद्ध होता है। केवल अपनी महत्वाकांक्षों में बाधक देव संस्कृति का विरोध और रक्षसंस्कृति का पोषक होने का दोष लगाकर उसे अपमानित करना कहां तक उचित है।
रावण की उपर्युक्त विशेषताओं की विवेचना के पूर्व हम उसकी वंश परम्परा की पृष्ठभूमि पर एक दृष्टि डाल लें। भारत में विशेष कर आर्य कहलाने वाली जातियों में जहां पितृ.सत्तात्मक परम्परा प्रचलित हैए वहीं भारत के मूल निवासियों तथा दक्षिण भारत की कुछ जातियों में अभी भी मातृसत्तात्मक परम्परा प्रचलित है। रावण इन दोनों परम्पराओं तथा देव और रक्ष दोनों संस्कृतियों का प्रतिनिधि है। पितृपक्ष से ब्रह्मा के मानस पुत्र पुलस्त्य उनके पुत्र विश्रवा और विश्रवा का पुत्र रावण है।
मातृ पक्ष दैत्य कुल के हेति की पत्नी भया से विद्युत्केशए विद्युत्केश की पत्नी सालकंटिका से मुकेशए मुकेश की पत्नी वेदवती से मालीए सुमाली और माल्यवान तीन पुत्र हुये। इन्हीं ने सुबेल पर्वत के त्रिकूट शिखर पर लंका बसाई। द्वितीय देवासुर संग्राम में देवताओं से पराजित हो सुमाली पाताल में जा छिपा। देवताओं द्वारा वैश्रवण को श्धनेश कुबेर्य का पद देकर लोकपाल बना दिया गया था और लंका दे दी गई थी। उसी लंका को प्राप्त करने के लिए सुमाली ने अपनी पुत्री केकसी को विश्रवा मुनि के पास सन्तानोत्पत्ति हेतु भेजा। इसी केकसी ने विश्रवा मुनि से रावणए कुम्भकरण तथा विभीषण पुत्र प्राप्त किये। सुमाली भी वहीं रहने लगा। विश्रवा मुनि की असावधानी से इन पुत्रों पर केकसी और सुमाली ने रक्ष संस्कृति का प्रभाव डाला। इस प्रकार रावण पितृपक्ष से ब्राह्मण और मातृपक्ष से दैत्य था और रक्ष संस्कृति का अनुयायी था।
तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में लिखा है.
उपजे जदपि पुलस्त्य कुलए पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर स्त्राप बसए भये सकल अधरूप।
विश्रवा ने इन्हें ब्राह्मणोचित वेदों की शिक्षा दी। सुमाली द्वारा प्रेरित रावण ने तपस्या कर ब्रह्मा तथा शिव जी से बहुत से वरदान प्राप्त किये।
अपनी तपस्या से प्राप्त वरों द्वारा शक्तिशाली होने तथा अपने नाना सुमाली तथा माता केकसी के उकसाने पर मुनि पद के बदले रावण ने राजपद प्राप्त किया। आसपास के राज्यों को जीतने के बाद उसने कुबेर से लंका भी छीन ली और उसे अपनी राजधानी बनाकर अपने नाना सुमाली की पुनरू लंका प्राप्त करने की इच्छा पूर्ण की।
उपर्युक्त विजय यात्रा में एक बार पराजित हो श्दानवेंद्र मकराक्षष्द्वारा बलि दिए जाने के समय को टालने के लिये वह कहता है.
श्मैं मुनि कुमार हूं। बलि चढ़ाने के पहले मुझे वेद पाठ करने दो।ष् दानवाचार्य चरक ने मकराक्ष से कहा. श्विश्रवा मुनि का पुत्र ठीक कहता हैए वह वेदपाठ करे।ष् रावण न उच्च स्वर से वेदपाठ करता रहा जब तक उसकी सेना ने वहां पहुंचकर उसकी रक्षा न कर ली।
रावण ने अपनी अजेय सामथ्र्य और प्रबल प्रतिभा से लंका का राज्य सुदृढ़ किया। इस तेजस्वी ने राक्षसेन्द्र की उपाधि धारण की। स्वयं रावण नीति और वेद के महान पंडित था। वह अकेला ही अजेय योद्धा और नीति विशारद था। महत्वाकांक्षा सभी में होती है। सुमाली दैत्य की भी महत्वाकांक्षा थी कि उसका नाती रावण शक्तिशाली बने। रावण माता और नाना के प्रभाव से त्रैलोक्य विजयी बनना चाहता था।
उसने देखा कि देवता जो अब उसके शत्रु बन गये थे यज्ञों द्वारा ही शक्ति प्राप्त करते हैं। अतरू उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में यज्ञ वर्जित किये थेए यद्यपि स्वयं यज्ञ करता था। वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण में अनेक प्रसंगों पर रावण को वेदपाठी लिखा है। यहां तक कि जब वह प्रतिशोध वश सीताहरण के लिए जाता हैए तब सीता जी के सामने वेदपाठ करते ही पहुंचता है।
उषाकाल होने पर सांगोपांग वेदों के ज्ञाता और बड़े.बड़े यज्ञ करने वाले वेदपाठी राक्षसोंए की वेदध्वनि को हनुमान जी ने सुना। निश्चय ही यह वेद पाठ रावण के जागने समय हो रहा था।
बाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के पंचमसर्ग के सभी 98 श्लोक रावण की राजधानी की कुशलता को परखने के लिए पर्याप्त हैं।
तुलसीदास जी भी रावण को यज्ञों का ज्ञाता मानते हैं। लंका कांड के दोहा क्रण् 84 से 85 तक दो दोहोंए चार चौपाई और एक छंद में रावण के यज्ञ करने का वर्णन उन्होंने किया है।
इस प्रकार यद्यपि रावण नैतिक दृष्टि से निंदा का पात्र है पर उसके यज्ञ पारंगत और कर्मकांड का विद्वान होने में कोई शक नहीं है।
अध्यात्म रामायण के अनुसार श्रीरामए रामेश्वरम में शिवस्थापना के लिए अपने उसी शत्रु रावण को पुरोहिताई के लिए बुलाते हैं और रावण ब्राह्मण होने के कारण वह इसे अस्वीकार नहीं कर पाता। ;रामनारायण तिवारी. विनायक फीचर्स



