राजस्थान की दक्षिणी सीमा जो गुजरात की सीमा से लगी है वहां विरातरा अथवा वीरातरा धाम में माँ वांकल का
दर्शनीय मंदिर विराजमान हैं। चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ;मालव प्रसारद्ध शक्तिपीठ हिंगलाज माता मंदिर ;वर्तमान
में पाकिस्तान में हैद्ध के दर्शनोपरान्त वांकल माता मंदिर वीरातरा का दर्शन करते हुए उज्जैन गए थे।
यहाँ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ के पुजारी विगत 600 वर्षों से गेलड़ा शाखा के प्रमार ;पंवारद्ध ही हैं जो कि
सम्राट विक्रमादित्य व सम्राट भोज के वंश के हैं। वर्तमान में इस कुल वंश के आदरणीय शेर सिंह जी प्रमुख पुजारी हैं।
संगमरमर के पाषाणों से निर्मित श्री वीरातरा माता का श्वेत मंदिर रेगिस्तानी रेतीले टीलों के बीच कमल के फूल की
तरह शोभायमान हो रहा है। प्राचीन मंदिर जीर्ण.शीर्ण हो गया था जिसका पुनरुद्धार यानी जीर्णोद्धार कर प्रतिष्ठा
विक्रम संवत् 2066 फाल्गुन सुदी 2ए तद्नुसार 27 फरवरी 2009 को हुई।
वीरातरा तलहटी वांकल माता जी मंदिर के स्थान पर नवीन मंदिर.निर्माण करते समय यानी प्राचीन मंदिर का
उत्थापन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि वीरातरा माता जी का श्रीविग्रह जो पूर्व में जहां
प्रतिष्ठित रही उसे किसी भी हाल में नहीं हटाया जाए और उसे मंदिर की मूल प्रतिमा समझकर नए शिखरबद्ध मंदिर
का निर्माण हो। शिल्प शास्त्रियों ने ऐसा करते हुए जमीन तल से शिखर तक लगभग 69 फीच 9 इंच ऊंचे शिखर वाले
भव्य संगमरमर के सुन्दर एवं शिल्प कला कृतियों से युक्त भव्य मंदिर का निर्माण कर दियाए इसमें भी वांकल के
अतिरिक्त अन्य कई देवी.देवाओं की प्रतिमाओं को भी प्रतिष्ठित किया गया।
इस नवनिर्मित मंदिर के सभी शिल्पखण्डों में मंदिर की शिल्पकला कृतियाँ उकेरी गई हैं। मंदिर में गर्भगृह में
मूलनायक के रूप में श्री वांकल वीरातरा माताजी की प्राचीन प्रतिमा यथास्थान पर ही प्रतिष्ठित है। इनकी रौद्र रुप
धारी सुन्दर आकर्षक आलौकिक एवं मन भावनी छवि आत्मसुखदाता है और शान्ति प्रदान करती है।
प्रति वर्ष सहस्त्रों श्रद्धालु भक्त जन यहां पहुंचते हैं। परिसर में धर्म शालाएं भोजन शालाए हाट.बाजार पीने के लिए
प्याऊए विश्रामकक्ष मंदिर का कार्यालय आदि बने हुए हैं। विशेष त्यौहारों.पर्वों में भारी मेला लगता है। बिजली
दूरभाष यातायात की सुविधा उपलब्ध है। स्वामी गोपाल आनन्द बाबा ,विनायक फीचर्स।



