कुछ लोग अपने विचारों से पहचाने जाते हैं, कुछ अपने संघर्षों से और कुछ अपने जीवन जीने के ढंग से। एस. एन. सुब्बाराव ऐसे ही विरल गांधीवादी थे, जिनकी पहचान खादी की कमीज, आधी पैंट, चेहरे पर सहज मुस्कान और होठों पर गीतों से बनती थी। वे युवाओं को केवल उपदेश नहीं देते थे, उनके साथ श्रम करते थे और उन्हें विश्वास दिलाते थे कि समाज को बदलने के लिए हिंसा नहीं, मनुष्य के भीतर की अच्छाई को जगाना जरूरी है। चंबल के बीहड़ों में हथियार उठाए लोगों से संवाद हो या सांप्रदायिक हिंसा से घायल भागलपुर में सद्भाव की तलाश,सुब्बाराव का जीवन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की कोशिशों से बना था।
7 फरवरी 1929 को बेंगलुरु में जन्मे सुब्बाराव का निधन 27 अक्टूबर 2021 को जयपुर में हुआ। वे ‘भाई जी’ के नाम से लोकप्रिय थे। गांधीवादी विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने किशोरावस्था में ही भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। 1942 में ब्रिटिश शासन के विरोध में नारे लिखने के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा ने उनके जीवन को सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा दी। उनके लिए आजादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं थी। वह भय, भेदभाव, हिंसा और अन्याय से मुक्त समाज बनाने का संकल्प भी थी।
सुब्बाराव की विशेषता थी कि वे विचारों को जीवन से जोड़ते थे। गीत उनके लिए मनोरंजन नहीं, सामाजिक चेतना जगाने का माध्यम थे। वे अनेक भाषाओं के गीतों के जरिए युवाओं को राष्ट्रीय एकता और मानवीय संवेदना का संदेश देते थे। “जय जगत पुकारे जा, सिर अमन पर बारे जा”, “युग जड़ता के खिलाफ, एक इन्कलाब है” और “जोड़ो भारत, जोड़ो भारत, नवयुग ने ललकारा है”,ऐसी पंक्तियां उनके विचारों की दिशा बताती हैं। “लहू का रंग एक है” का संदेश धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर मनुष्य की साझा पहचान को सामने रखता था। उनके गीतों में बदलाव की आकांक्षा थी, लेकिन घृणा नहीं, संघर्ष का आह्वान था, लेकिन हिंसा का महिमामंडन नहीं।
गांधी जन्मशती वर्ष 1969 में सुब्बाराव ने गांधी-दर्शन रेलयात्रा की परिकल्पना और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य गांधी के जीवन और विचारों को देश के छोटे-बड़े स्टेशनों, कस्बों और विद्यार्थियों तक पहुंचाना था। वे गांधी को स्मारकों और सरकारी समारोहों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। उनके लिए गांधी वर्तमान की समस्याओं से जूझने की कार्यपद्धति थे।
युवाओं के लिए आयोजित श्रम शिविर भी इसी सोच का विस्तार थे। देश के विभिन्न हिस्सों से आए युवक-युवतियां गांवों में श्रम करते, सड़क निर्माण और दूसरे रचनात्मक कार्यों में भाग लेते तथा स्थानीय समुदायों के साथ समय बिताते थे। श्रम के बीच भाषा, जाति और प्रांत की दूरियां घटती थीं। सुब्बाराव मानते थे कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि समाज के लिए काम करने में है। 1971 में स्थापित राष्ट्रीय युवा परियोजना के जरिए उन्होंने युवाओं को सामाजिक सेवा, सद्भाव और राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने का प्रयास किया।
उनके जीवन का सबसे चर्चित अध्याय चंबल के बीहड़ों से जुड़ा है। चंबल लंबे समय तक डकैती, बंदूक और भय का पर्याय बना रहा। वहां सक्रिय गिरोहों के पीछे अपराध के साथ सामाजिक विषमता, बदले की परंपरा और स्थानीय सत्ता-संघर्ष जैसी जटिल परिस्थितियां भी थीं। केवल पुलिस की ताकत से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं था। जरूरी था कि हिंसा के रास्ते पर जा चुके लोगों से संवाद किया जाए और उन्हें समाज में लौटने का अवसर मिले।
सुब्बाराव ने चंबल में रचनात्मक कार्य और संवाद के जरिए विश्वास बनाने की कोशिश की। इस व्यापक शांति-प्रक्रिया में विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण और अनेक गांधीवादी कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। पी. वी. राजगोपाल भी इस प्रयास के सहभागी थे। राजगोपाल ने बाद में एकता परिषद के माध्यम से भूमिहीनों, आदिवासियों और वंचित समुदायों के भूमि तथा आजीविका अधिकारों के लिए देशव्यापी आंदोलन खड़ा किया। एकता परिषद और जय जगत के विवरण चंबल में सुब्बाराव, राजगोपाल और अन्य गांधीवादी कार्यकर्ताओं की साझा भूमिका का उल्लेख करते हैं।
27 सितंबर 1970 को स्थापित महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा, चंबल में शांति और रचनात्मक कार्यों का केंद्र बना। 14 अप्रैल 1972 को इसी आश्रम में मोहर सिंह, माधो सिंह सहित अनेक बागियों ने हथियार डाले। विभिन्न स्रोतों में आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या अलग-अलग मिलती है, लेकिन 600 से अधिक बागियों के आत्मसमर्पण की प्रक्रिया से सुब्बाराव का नाम प्रमुखता से जुड़ा है। इस घटना का महत्व केवल बंदूकों के शांत होने में नहीं था। यह उस विश्वास की जीत थी कि हिंसा में फंसे मनुष्य को भी संवाद, पश्चात्ताप और पुनर्वास का अवसर दिया जा सकता है। आश्रम ने आत्मसमर्पण करने वाले लोगों और उनके पीड़ितों के परिवारों के कल्याण की दिशा में भी काम किया।
चंबल की यह कहानी अहिंसा को कमजोरी मानने वाली धारणा को चुनौती देती है। किसी हथियारबंद व्यक्ति से संवाद करना, उसके भीतर भरोसा जगाना और उसे हिंसा से बाहर आने के लिए तैयार करना साहस का काम है। लेकिन आत्मसमर्पण के बाद आजीविका, परिवार और सामाजिक पुनर्वास के सवालों का समाधान भी जरूरी है। सुब्बाराव की दृष्टि इसी व्यापक अर्थ में गांधीवादी थी,हिंसा रोकने के साथ उन परिस्थितियों को बदलना, जिनमें हिंसा पनपती है।
इस विचार का एक दूसरा रूप 2012 के जनसत्याग्रह में दिखाई दिया। पी. वी. राजगोपाल और एकता परिषद के नेतृत्व में हजारों भूमिहीन तथा वंचित लोग भूमि, आवास और आजीविका के अधिकारों की मांग लेकर ग्वालियर से दिल्ली की ओर चले। 2 अक्टूबर 2012 को शुरू हुई इस पदयात्रा ने उन लोगों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया, जिनकी आजीविका जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर थी। आंदोलन के बाद सरकार के साथ दस सूत्री समझौता हुआ। चंबल में हथियार छोड़ने और जनसत्याग्रह में अधिकारों की मांग करने की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन दोनों में अहिंसक संघर्ष, संवाद और सामाजिक न्याय का साझा सूत्र था।
सुब्बाराव के जीवन में सांप्रदायिक सद्भाव का अध्याय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 24 अक्टूबर 1989 को भागलपुर में शुरू हुई सांप्रदायिक हिंसा ने शहर और आसपास के क्षेत्रों को गहरे घाव दिए। लोगों की जान गई, परिवार उजड़े और समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ा। ऐसी त्रासदी के बाद शांति की अपील करना आसान है, लेकिन टूटे हुए भरोसे को फिर से बनाना कठिन। इसके लिए पीड़ितों की पीड़ा सुनना, न्याय और जवाबदेही के सवालों को जगह देना तथा समाज को प्रतिशोध से बचाना जरूरी होता है।
भागलपुर की उसी हिंसा के बाद सुब्बाराव से मेरी पहली मुलाकात हुई। एक पत्रकार के रूप में मेरे सामने पीड़ितों की पीड़ा, हिंसा के कारण और व्यवस्था की जिम्मेदारियों से जुड़े सवाल थे। सुब्बाराव के व्यक्तित्व में मुझे ऐसा गांधीवादी कार्यकर्ता दिखाई दिया, जो नफरत का जवाब दूसरी नफरत से देने में विश्वास नहीं करता था। उनका आग्रह था कि हिंसा से प्रभावित समाज में संवाद की संभावना जीवित रखी जाए। सद्भाव का अर्थ पीड़ितों के सवालों को दबाना नहीं,न्याय के बिना शांति का आह्वान अधूरा है। लेकिन न्याय की मांग को सामूहिक घृणा में बदलने से रोकना भी उतना ही जरूरी है।
1994 में सद्भावना रेलयात्रा के दौरान सुब्बाराव से मेरी दूसरी मुलाकात भागलपुर में हुई। यह यात्रा विभिन्न क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर युवाओं, को जोड़ने और सांप्रदायिक तनाव से प्रभावित समाज में संवाद के अवसर बनाने की कोशिश थी। गीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, साइकिल यात्राएं और स्कूल-कॉलेजों में बातचीत उनके काम के महत्वपूर्ण माध्यम थे। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल कार्यक्रम करना नहीं, बल्कि लोगों के बीच भरोसे के रास्ते खोलना था। सुब्बाराव की उपस्थिति में पहली मुलाकात की स्मृतियां फिर जीवित हो उठीं। हिंसा के बाद शांति की बात करना और कुछ वर्षों बाद उसी समाज के बीच दोबारा पहुंचना, उनके काम की निरंतरता को दर्शाता था।
उनकी सादगी भी उनके संदेश का हिस्सा थी। आधी पैंट और खादी की कमीज पहनने वाला यह व्यक्ति पद और आडंबर से दूर रहता था। युवाओं के बीच वे किसी दूर बैठे नेता की तरह नहीं, बल्कि साथी की तरह पहुंचते थे। ‘भाई जी’ संबोधन में इसी आत्मीयता और भरोसे का भाव था। वे युवाओं को केवल देश का भविष्य नहीं मानते थे, उन्हें वर्तमान में सामाजिक बदलाव का सक्रिय सहभागी बनाना चाहते थे।
27 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है। चंबल की शांति-प्रक्रिया, भागलपुर में सद्भाव के प्रयास और जनसत्याग्रह की भूमि-अधिकार यात्रा हमें बताते हैं कि अहिंसा निष्क्रियता नहीं, अन्याय के विरुद्ध सक्रिय और संगठित हस्तक्षेप है। इन आंदोलनों को एक जैसा मानना उचित नहीं, लेकिन वे यह साझा सीख देते हैं कि टिकाऊ शांति के लिए न्याय, सम्मान और संवाद जरूरी हैं।
सुब्बाराव अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका जीवन आज भी एक सवाल छोड़ता है कि क्या हम मनुष्य को उसकी सबसे बुरी पहचान तक सीमित कर देंगे, या उसके भीतर परिवर्तन की संभावना को भी जगह देंगे? उनके गीत केवल सुर नहीं थे, यात्राएं केवल दूरी तय करने का साधन नहीं थीं और श्रम शिविर केवल काम करने के आयोजन नहीं थे। ये सब समाज को जोड़ने की कोशिशें थीं। सुब्बाराव की विरासत इसी विश्वास में जीवित है कि मनुष्य को जोड़ना कठिन जरूर है, लेकिन समाज को बचाने का रास्ता इसी कठिन काम से होकर गुजरता है।(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)



