कम्युनिस्ट विचारधारा है क्या? यह समस्त राष्ट्र में अराजकता फैलाना, शांति-व्यवस्था को चरमराने का तंत्र है। कम्युनिस्ट शासन में न खुलकर बोलने का अधिकार, न पसंद से जीने का अधिकार, न आवाज उठाने का अधिकार। तानाशाह राष्ट्राध्यक्ष की घोषणा ही कानून, उसका आदेश ही शासन और उसकी दी गई सजा ही न्याय। कम्युनिस्ट शासन एक चरम अतिवाद है, कम से कम इतना तो समझा ही जा सकता है।

अभी काकरोचों का जो अराजक आंदोलन देखा जा रहा है, वह आखिर है क्या? सामान्य तौर पर यह माओवादी आंदोलन जैसा है। मगर इतना ही नहीं, बल्कि इसके पीछे बहुत बड़ा तंत्र है, बहुत बड़ा षड्यंत्र है। इस षड्यंत्र में कई-कई गुट शामिल हैं, देश-विदेश के।

आज की तारीख में भारत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक रूप से विश्व का अग्रणी राष्ट्र है। इससे जो कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक हैं, उनके पेट में भयानक दर्द हो रहा है और वे भारत को एक कम्युनिस्ट राष्ट्र बनाने के लिए आतुर हैं। मगर मात्र अभिजीत दीपके, ध्रुव राठी से भारत में तख्तापलट नहीं हो सकता था, इसलिए इस विचारधारा में आम आदमी पार्टी को शामिल किया गया, कांग्रेस और उसके गठबंधन को शामिल किया गया, और देश के भोले-भाले युवाओं में पैसे बांटकर, उन्हें बुद्धू बनाकर, उन्हें हिंसक बनाकर – कुल मिलाकर झूठ का सहारा लेकर काकरोच जनता पार्टी का बैनर बनाकर, जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन ही नहीं, इससे आगे बढ़कर हिंसक आंदोलन छेड़कर देश की शांति-सुव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया जा रहा है।

उपरोक्त चर्चा से दो बातें खुलकर सामने आती हैं कि विदेश तो विदेश, भारत की तमाम तथाकथित राजनीतिक पार्टियां भी देश के साथ विश्वासघात कर रही हैं। इस आंदोलन में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की भी भागीदारी है। यह बहुत ध्यान देने की बात है कि ये काकरोचवादी अपनी क्षुद्र मानसिकता को बड़ी चालाकी से दबाकर, लोगों को भ्रम में डालकर यह प्रचार करने में लगे हैं कि वे सचमुच राष्ट्रवादी हैं, सचमुच देशप्रेमी हैं, देश को संकट से उबारना चाहते हैं, देश का भला चाहते हैं, देश का विकास चाहते हैं व देश में शुद्ध-विशुद्ध लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते हैं, वर्तमान की मोदी सरकार देश के लिए अच्छी नहीं है, वगैरह-वगैरह।

मगर ध्यान दीजिए, जिस दिन ये काकरोची भारत की सत्ता पर काबिज होंगे, तिरंगे को कुचल देंगे, संविधान को नष्ट कर देंगे और अति-शासन का ऐलान कर देंगे। इसलिए हम भारतवासी यह सोचकर चलें कि किसी भी हालत में देश को बर्बाद न होने दें। इन काकरोचों का अंत शुरुआत में ही लिखा जा चुका है। गलत मंसूबे कामयाब नहीं होते। लालच में पड़कर देश की गरिमा व देश के साथ न्याय की भावना को चोट पहुंचाना देश के साथ बहुत बड़ा द्रोह है। (आर. सूर्य कुमारी-विनायक फीचर्स)

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