कभी-कभी लगता है कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य की कुछ बेचैनियां सदैव वैसी ही रहती हैं। द्वापर में भी समाज अन्याय, अत्याचार, अहंकार और अधर्म से जूझ रहा था और आज भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। फर्क इतना है कि तब अत्याचार का चेहरा दिखाई देता था, आज वह कई बार व्यवस्था, स्वार्थ, छल, लालच और संवेदनहीनता के पीछे छिप जाता है। इसलिए जब जन्माष्टमी आती है तो मन अनायास ही पुकार उठता है- हे कृष्ण, तुम फिर आ जाओ…
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ, जब मथुरा का राजसिंहासन कंस के अत्याचार का प्रतीक बन चुका था। प्रजा भय में थी, सत्ता निरंकुश थी और सच बोलना आसान नहीं था। कृष्ण का जन्म किसी राजमहल की सुविधा में नहीं, कारागार में हुआ। आधी रात को जन्मे उस बालक ने आगे चलकर यह संदेश दिया कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, उसके बाद प्रकाश का जन्म निश्चित है।
आज जब हम अपने आसपास देखते हैं तो अनेक सवाल सामने खड़े होते हैं। क्या हम सचमुच उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी कल्पना हमने आजादी के समय की थी? क्या विकास के साथ संवेदनशीलता भी बढ़ी है? क्या तकनीक ने मनुष्य को बेहतर बनाया है? क्या राजनीति में विचार और समाज में संवाद मजबूत हुआ है? इन सवालों के बीच कृष्ण का स्मरण महज धार्मिक परंपरा नहीं रह जाता, वह आत्ममंथन का अवसर बन जाता है।
कृष्ण ने जीवन को किसी एक रंग में नहीं देखा। वे गोकुल के नटखट कान्हा भी हैं, वृंदावन के मुरलीधर भी, मथुरा के कंस-विनाशक भी और कुरुक्षेत्र के सारथी भी। उनके व्यक्तित्व में प्रेम है तो नीति भी है, करुणा है तो साहस भी, संगीत है तो संघर्ष भी। शायद यही वजह है कि हजारों वर्ष बाद भी कृष्ण आज के मनुष्य के सबसे करीब दिखाई देते हैं।
आज समाज में सबसे बड़ा संकट शायद भरोसे का है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है, रिश्तों में अपेक्षाएं बढ़ रही हैं और सामाजिक जीवन में धैर्य घट रहा है। सोशल मीडिया ने संवाद के रास्ते खोले हैं, लेकिन उसी के साथ मनुष्य को प्रतिक्रियाओं की दुनिया में भी धकेला है। कुछ शब्द, एक तस्वीर या एक अधूरी सूचना समाज में तनाव पैदा कर सकती है। कृष्ण होते तो शायद सबसे पहले यही कहते कि हर सूचना पर प्रतिक्रिया देने से पहले विवेक का उपयोग करो।
कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश यही था कि जीवन परिस्थितियों से नहीं, दृष्टिकोण से संचालित होता है। महाभारत में उन्होंने अर्जुन को युद्ध के बीच खड़े होकर कर्म का संदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को पलायन का रास्ता नहीं दिखाया। उन्होंने कहा कि जब सामने अन्याय हो तो अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
आज के दौर में यह संदेश और महत्वपूर्ण हो जाता है। भ्रष्टाचार हो, महिलाओं के प्रति अपराध हो, कमजोरों का शोषण हो, झूठ और अफवाहों का प्रसार हो या सार्वजनिक जीवन में बढ़ती कटुता,इन सबके सामने समाज की चुप्पी भी एक तरह की जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति अर्जुन की तरह अपने-अपने कुरुक्षेत्र में खड़ा है। सवाल यह है कि वह सही समय पर सही पक्ष चुनता है या सुविधा के लिए मौन रह जाता है।
कृष्ण ने धर्म को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा। उनके लिए धर्म का अर्थ था- कर्तव्य, न्याय और सत्य के पक्ष में खड़ा होना। यही कारण है कि गीता का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक दुनिया में हमारे पास विज्ञान है, तकनीक है, संचार के साधन हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, आर्थिक अवसर हैं, लेकिन इन सबके बीच यदि विवेक और नैतिकता कमजोर पड़ जाए तो प्रगति अधूरी रह जाती है।
आज राजनीति भी कृष्ण के संदेश से बहुत कुछ सीख सकती है। राजनीति लोकतंत्र की सेवा का माध्यम है, सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं। विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति शत्रु नहीं होता। कृष्ण ने संवाद को महत्व दिया। उन्होंने युद्ध से पहले शांति का प्रयास किया। इसका अर्थ साफ है कि संघर्ष अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। आज सार्वजनिक जीवन में संवाद की जगह आरोप और प्रत्यारोप बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे समय में कृष्ण का शांति-दूत वाला स्वर याद करना जरूरी है।
कृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि सफलता का अर्थ दूसरों को पीछे छोड़ देना नहीं है। गोकुल का कान्हा अपने मित्रों के बीच सहज है। सुदामा के साथ उनका संबंध बताता है कि मित्रता में पद, धन और प्रतिष्ठा की कोई जगह नहीं होती। आज जब रिश्तों का मूल्य कई बार आर्थिक और सामाजिक हैसियत से तय होने लगा है, तब कृष्ण-सुदामा की कथा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की असली पहचान उसकी संवेदना है और शायद आज सबसे ज्यादा जरूरत उसी संवेदना की है।
हमारे शहर बढ़ रहे हैं, इमारतें ऊंची हो रही हैं, सड़कों का विस्तार हो रहा है, अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, लेकिन क्या हमारे भीतर का मनुष्य भी उतना ही बड़ा हो रहा है? किसी गरीब की परेशानी देखकर हम कितनी देर रुकते हैं? किसी बुजुर्ग की अकेलेपन की आवाज कितनी दूर तक पहुंचती है? किसी बच्चे के सपने में हम कितना अपना योगदान देते हैं? किसी पीड़ित के लिए हमारी आवाज कितनी मजबूत होती है?
जन्माष्टमी इन सवालों से बचने का नहीं, उनका सामना करने का पर्व है। इस बार जब मंदिरों में घंटियां बजेंगी, घरों में झूले सजेंगे और आधी रात को कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा, तब शायद हमें एक क्षण ठहरकर सोचना चाहिए कि हम किस कृष्ण को याद कर रहे हैं। माखन चुराने वाले बाल कृष्ण को, बांसुरी बजाने वाले कृष्ण को या अर्जुन के सारथी कृष्ण को?
आज हमें तीनों की जरूरत है। हमें जीवन में बाल कृष्ण की सहजता चाहिए, तो मुरलीधर का प्रेम भी चाहिए और साथ में पार्थसारथी का विवेक भी। हमें अन्याय के सामने खड़े होने का साहस चाहिए और अपने निर्णयों में धर्म का बोध भी।
कृष्ण के आने का अर्थ शायद किसी चमत्कार का इंतजार करना नहीं है। कृष्ण तब आते हैं, जब कोई अन्याय के सामने सच बोलता है। कृष्ण तब आते हैं, जब कोई कमजोर का हाथ थामता है। कृष्ण तब आते हैं, जब कोई सत्ता से ऊपर सत्य को मानता है। कृष्ण तब आते हैं, जब कोई अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के बारे में सोचता है।
इसलिए आज जरूरत आसमान की ओर देखकर यह पूछने की नहीं कि कृष्ण कब आएंगे। जरूरत अपने भीतर झांकने की है कि हम उनके आने लायक समाज बना भी रहे हैं या नहीं।
द्वापर में कृष्ण देवकी के गर्भ से जन्मे थे। आज शायद उन्हें किसी गर्भ से जन्म लेने की जरूरत नहीं। आज उन्हें हमारे विचारों में जन्म लेना है, हमारे व्यवहार में उतरना है, हमारे निर्णयों में दिखाई देना है और हमारे समाज की संवेदना में जीवित होना है। फिर भी मन की पुकार यही है-
हे कृष्ण, तुम फिर आ जाओ…
आओ तो इस बार किसी कारागार में नहीं, हमारे भीतर जन्म लेना। आओ तो किसी एक कंस का अंत करने नहीं, हमारे भीतर के अहंकार, लोभ और भय को समाप्त करने। आओ तो हमें यह समझाने कि धर्म किसी मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं, वह हमारे आचरण में दिखाई देता है। आओ और फिर से कहो- कर्म करो, सत्य के साथ खड़े रहो और परिणाम की चिंता में अपने कर्तव्य से मत हटो।
क्योंकि आज भी समाज को एक कृष्ण की जरूरत है,और शायद उससे ज्यादा जरूरत है,कृष्ण के विचारों को अपने भीतर जगाने की।(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)



