रमेश मनोहरा .                                                                                                                                                                                                                                    महेश ये कहानियाँ उम्र भर के लिए रोटी नहीं दे सकती। पेट भरने के लिए नौकरी या कोई धंधा करो। कब तक तुम्हें बैठे.बैठे खिलाते रहूंगा। आखिर प्रभुदयाल ने यह कहकर अपने मन के भीतर जमी सारी भड़ास निकाल ली। प्रभुदयाल ने जो कुछ कहा सच कहा हिन्दी में एम0ए0 करने के बाद महेश बेरोजगार है। अब तक न जाने कितने इण्टरव्यू व लिखित परीक्षा दे चुका है। मगर नौकरी उससे दूर भाग रही है। आजकल कम्पनियों की नौकरी में अधिक आकर्षण हैए तैयारी करके बेरोजगार कम्पनियों की ओर अधिक भाग रहे हैं। मगर महेश ने यह तैयारी न करते हुए हिन्दी में एम0ए0किया। अब वह अपने को साहित्यकार होने का सपना देख रहा है।
जब वह हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहा था तभी से कहानी लेखन की ओर अग्रसर होगया था। पहली कहानी उसकी स्कूल की पत्रिका में छपी जिसे काफी सराहा गया तब उसे लिखने का हौसला मिला उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जब वह कॉलेज में आ गया तब तक कहानीकार बन चुका था। देश की पत्र.पत्रिकाओं में उसकी कहानियां प्रकाशित होने लगी। किसी पत्र या पत्रिका में प्रकाशित कहानी पर पारिश्रमिक भी मिलने लगा। लेखन के साथ पढ़ाई भी नियमित करता रहा। कई सेमीनारों में वह हिस्सा लेता रहा। इससे उसकी साहित्यकारों के बीच जान.पहचान बढ़ीए जब उसने एम0ए0किया तब तक स्थापित कहानीकार हो गया था।
जब हिन्दी में एम0ए0करने के बाद कॉलेज से निकला तब बेरोजगारी उसका इंतजार पलक पावड़े बिछाकर कर रही थी। नौकरी के लिए आवेदन का सिलसिला जो शुरू हुआ इसी में उसने 5 साल गुजार दिये। मगर उसे नौकरी नहीं मिली। पिता चिढ़चिढ़े रहने लगे। वह पिता पर पूर्ण रूप से आश्रित रहा उसे चुप देख पिता फिर बोले सुना नहीं मैं क्या कह रहाहूं।
पापा अब मैं नासमझ नहीं हूं। नौकरी के लिए प्रयास कर रहा हूं।
अरे तेरे साथ के कितने थे। वे सब कहीं न कहीं लग गए। एक तू ही बचा है जिसने कहानियों को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। कहानियों से हटकर अब रोजी रोटी के बारे में भी सोच। जल्दी से कहीं तुम लग जाओ फिर तुम्हारी शादी कर निश्चिंत हो जाऊं
देखिए पापा कोशिश तो मैं पूरी कर रहा हूं। पटवारी का प्रशिक्षण मैंने लिया है। मुझे विश्वास है कि यह नौकरी अवश्य मिलेगी।
विश्वास विश्वास विश्वास कब तक और विश्वास करूं इसी विश्वास ने तोड़ दिया है। आखिर प्रभुदयाल का गुस्सा फट पड़ा मगर महेश जानता है जब तक पापा अपनी भड़ास नहीं निकाल लेते हैंए तब तक उनका भाषण चलता रहेगा।
ऐसे अवसर पर महेश चुपचाप बाहर निकल जाता है। निरुद्देश्य सड़कों पर घूमता है कहानी का कोई प्लाट सोचता है तब वह कहानी लिखने बैठ जाता है। कहानी लेखन में खो जाता है। सरस्वती का वरद हाथ था उस पर कि उठते.बैठते कहानी के प्लाट उसके दिमाग में मंडराते रहते है। तब कोई कहानी किसी पत्रिका में प्रकाशित होती है कहानी के संबंध में पत्र भी मिलते हैं। संपादकों के पत्र भी आते हैं कहानी भिजवाने के लिए। तब इन क्षणों में वह अपने बेरोजगारी को भूल जाता है। इसी बड़ी उपलब्धि से उसका मन बाग.बाग हो जाता है। ऐसे में लिखना और ताजी कहानी को संपादक को भेजना इसी में उसका मन खोया रहता है।
इसके बावजूद भी बेरोजगारी के दिन उसे तंग करते हैं। लेखन रोजगार का समाधान नहीं है। हिन्दी साहित्य समर्थ जरूर हुआए मगर लेखन के जरिये इतनी कमाई नहीं कर सकते हैं। इसी लेखन ने उसे सम्मान दिया हैए पहचान दी है साहित्य जगत में वह एक युवा कहानीकार के नाम से जाना जाता है। कोई वरिष्ठ साहित्यकार यदि उसकेघर आता है तब वह प्रसन्न हो जाता है। मगर पापा को किसी साहित्यकार का घर आना और साहित्य पर चर्चा करना अच्छा नहीं लगता। साहित्य को वे व्यर्थ बकवास बताते हैं। पिता का एक मात्र उद्देश्य यही है कि वह कमाने के गुर सीखे। साहित्य लेखन और उस पर चर्चा करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। वह भी जानता है पहले रोटी का इंतजाम हो साहित्य संगीत यह सब बाद के शौक है।
पापा की सोच अपनी जगह सही थी। उसकी कहीं नौकरी लग जाए फिर उसकी शादी कर पिता के दायित्व से मुक्त हो जाएए फिर खूब लेखन करें उसको कोई कुछ न कहेगा। पापा शिक्षा विभाग में हेड क्लर्क हैं। पगार कोई अधिक नहीं है। उसकी दोनों बड़ी बहनों की शादी का कर्जा अभी तक नहीं उतरा है। ऐसे में एकमात्र बेटे पर उनकी पूरी निगाह है जब तीन साल बाद वे सेवा निवृत्त होंगेए तब वही उनका सहारा होगा। अतरू पिताजी सेवा निवृत्ति के पहले ही उसे आत्म निर्भर देखना चाहते हैं।
तीन घंटे निरुद्देश्य घूमने के बाद वह हताश सा घर लौटाए रह.रहकर पिता की बातें उसे भीतर तक चुभ गई थी। कब लगेगी उसकी नौकरीए यही नौकरी उसके जी का जंजाल बनी हुई थी। उसे कहानी लेखन से नफरत हो गई।
अर्थाभाव में उसने कई लेखकों को टूटते हुए देखा है। लगता है उसका भी नम्बर आने वाला है। पिता के ताने उलाहने उसने खूब सुने हैं। अब भी सुन रहा है। अब कमाने के लिए कुछ तो करना होगा। रोजी.रोटी का इंतजाम करना उसकी पहली शर्त है। आज वह इस बारे में इतना क्यों सोच रहा है तभी मां ने आकर कहा. अरे महेश इतने उदास क्यों लग रहे हो
पापा ने कह दिया अब कोई नौकरी या काम धंधा करो कब तक बैठे.बैठे खिलाते रहूंगा। कहकर महेश ने अपनी व्यथा उगल दी।
दिल छोटा न कर विश्वास रख एक दिन नौकरी अवश्य मिलेगी। आश्वस्त करती हुई मां बोली. सब दिन एक जैसे नहीं होते है कहते हैं न घूरे के भी एक दिन दिन फिरते हैं फिर तेरे पिता तो आजकल चिढ़चिढ़े रहने लगे है तुम्हारी नौकरी न लगने के कारण।
पोस्टमेन बाहर से आवाज आई. मां बोली. जा पोस्टमेन आया है।
अरे मां पोस्टमेन प्रकाशित कहानी का अंक लाया होगा या फिर प्रकाशित कहानी पर कोई मनीऑर्डर। स्वीकृत अस्वीकृत कहानी का पत्र होगा मगर मां ये सब मेरा नाम दे सकते हैं रोटी नहीं।काश! यह विचार पहले ही आ जाता तो आज कहानियों के चक्कर में तो नहीं पड़ताए जा पहले डाक ले आ। महेश बाहर आया रजिस्ट्री थी हस्ताक्षर पर उसने रजिस्ट्री प्राप्त की फिर उसे खोलकर पढ़ाए मुरझाया चेहरा खिल उठाए अन्दर आते हुए मां से बोला मां खुश खबरी। कोन सी खुशखबरी सुना रहा है।मेरी पटवारी पद पर नियुक्ति हो गई यह नियुक्ति पत्र है मां।
सच महेश यह कहते समय मां की आंखों में दुगनी चमक आ गई। हाँ माँ इस महीने की 20 तारीख तक ड्यूटी ज्वाइन करना है। महेश अभी यह बात कर रहा था तब पिता भी वहां आ गए शायद अंतिम बात पिता ने सुन ली उनकी आंखों में चमक आ गई। ;विभूति फीचर्स